उत्तर प्रदेश की राजनीति में अखिलेश यादव लंबे समय से एक प्रमुख चेहरा रहे हैं, लेकिन उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल से जुड़े कुछ मामले आज भी राजनीतिक और कानूनी चर्चा का हिस्सा हैं। इनमें हमीरपुर का कथित अवैध खनन मामला भी शामिल है, जिसकी जांच CBI ने की थी।मामला उस दौर का है जब अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और उनके पास खनन विभाग का प्रभार भी रहा था। बाद में खनन पट्टों के आवंटन और उनके नवीनीकरण में कथित अनियमितताओं को लेकर जांच शुरू हुई।
खनन पट्टों पर उठे सवाल
हमीरपुर में वर्ष 2012 से 2016 के बीच खनन पट्टों को जारी करने और उनके नवीनीकरण की प्रक्रिया जांच के घेरे में आई। आरोपों में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं करने और नियमों के विपरीत खनन पट्टे दिए जाने की बात शामिल थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद CBI ने मामले की जांच अपने हाथ में ली। जांच के दायरे में तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारियों, पट्टाधारकों और अन्य संबंधित लोगों को शामिल किया गया।
2019 में CBI की छापेमारी
जनवरी 2019 में CBI ने मामले से जुड़े कई ठिकानों पर छापेमारी की। तत्कालीन हमीरपुर जिलाधिकारी बी. चंद्रकला से जुड़े परिसरों की भी तलाशी ली गई। जांच एजेंसी की कार्रवाई के बाद यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया और तत्कालीन सरकार के दौरान खनन व्यवस्था को लेकर राजनीतिक सवाल उठे।
अखिलेश यादव को CBI ने क्यों बुलाया?
फरवरी 2024 में CBI ने अखिलेश यादव को CrPC की धारा 160 के तहत नोटिस जारी किया। इस प्रावधान के तहत जांच एजेंसी ऐसे व्यक्ति को पूछताछ के लिए बुला सकती है, जिसके पास जांच से संबंधित जानकारी होने की संभावना हो। अखिलेश यादव का नाम जांच में इसलिए महत्वपूर्ण हुआ क्योंकि जिस अवधि के फैसलों की जांच हो रही थी, उस दौरान वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और खनन विभाग उनके पास रहा था हालांकि, नोटिस में उन्हें गवाह के तौर पर बुलाया गया था।