हरियाणा सरकार ने सरकारी विभागों में भुगतान प्रक्रिया को अधिक समयबद्ध और जवाबदेह बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने चंडीगढ़ में विभिन्न विभागों द्वारा अपनाई जा रही ‘गुड प्रेक्टिसिज’ की समीक्षा करते हुए सरकारी भुगतान में अनावश्यक देरी को लेकर अधिकारियों को निर्देश दिए। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत यदि विभागीय स्तर पर भुगतान में अनावश्यक विलंब होता है, तो संबंधित फर्म, कंपनी या ठेकेदार को विलंबित अवधि का ब्याज सहित भुगतान सुनिश्चित किया जाएगा।
देरी का वित्तीय बोझ सरकार उठाएगी
मुख्यमंत्री के निर्देश के अनुसार सरकारी काम पूरा करने वाली कंपनियों, फर्मों और ठेकेदारों को उनके वैध भुगतान के लिए अनावश्यक इंतजार नहीं करना पड़ेगा। यदि भुगतान प्रक्रिया विभागीय स्तर पर लंबित रहने के कारण तय समय से आगे बढ़ती है, तो देरी की अवधि के लिए ब्याज का भुगतान भी किए जाने का प्रावधान प्रस्तावित है। सरकार का उद्देश्य भुगतान प्रक्रिया में होने वाली देरी से निजी संस्थाओं पर पड़ने वाले अतिरिक्त वित्तीय बोझ को कम करना है। इससे सरकारी परियोजनाओं से जुड़े ठेकेदारों और कंपनियों के लिए भुगतान व्यवस्था को अधिक स्पष्ट और समयबद्ध बनाने की कोशिश की जाएगी।
अधिकारी की लापरवाही पर होगी वसूली
प्रस्तावित योजना में केवल कंपनियों या ठेकेदारों को ब्याज देने का प्रावधान ही नहीं होगा, बल्कि भुगतान में देरी के लिए जिम्मेदारी भी तय की जाएगी। मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही के कारण भुगतान में देरी होती है, तो संबंधित जिम्मेदार व्यक्ति से ब्याज की राशि की वसूली की जाए। इस व्यवस्था का उद्देश्य सरकारी तंत्र में जवाबदेही बढ़ाना और भुगतान प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से लंबित रखने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना है।
समयबद्ध भुगतान पर सरकार का जोर
मुख्यमंत्री ने बैठक में विभागीय स्तर पर अपनाई जा रही अच्छी कार्यप्रणालियों की समीक्षा की और उन्हें प्रभावी तरीके से लागू करने पर जोर दिया। सरकार की प्रस्तावित व्यवस्था में समयबद्ध भुगतान को प्रशासनिक कार्यप्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की तैयारी है। मुख्यमंत्री ने कहा कि समयबद्ध भुगतान, जवाबदेह व्यवस्था और तेज विकास सुशासन के संकल्प का हिस्सा हैं। सरकार का जोर ऐसी व्यवस्था तैयार करने पर है, जिसमें भुगतान प्रक्रिया में देरी होने की स्थिति में जिम्मेदारी तय हो और संबंधित पक्ष को वित्तीय नुकसान का सामना न करना पड़े।