भारत में बढ़ती स्क्रीन थकान: क्यों लोग अब डिजिटल डिटॉक्स की ओर लौट रहे हैं

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भारत में बढ़ती स्क्रीन थकान: क्यों लोग अब डिजिटल डिटॉक्स की ओर लौट रहे हैं

भारत में बढ़ती स्क्रीन थकान क्यों लोग अब डिजिटल डिटॉक्स की ओर लौट रहे हैं

digital detox trend india: पिछले कुछ महीनों में देश के अलग-अलग शहरों से एक दिलचस्प बदलाव सामने आया है। काम से लेकर मनोरंजन तक सबकुछ डिजिटल हो जाने के बाद अब लोग उसी दुनिया से विराम लेने की कोशिश कर रहे हैं, जिसकी ओर वे रोज़ सुबह उठते ही कदम बढ़ाते हैं। डिजिटल डिटॉक्स जो कुछ समय पहले तक एक सीमित-सा विचार लगता था-आज कई परिवारों और युवाओं की दिनचर्या में जगह बना रहा है।

मुंबई के एक मीडिया ऑफिस में काम करने वाली रिया इसे अपने जीवन का अहम कदम बताती हैं। “पहले दिन मुझे लगा कि फोन न होने से समय रुक जाएगा, लेकिन हुआ उलटा मैंने नोट किया कि मैं बातें ज़्यादा ध्यान से सुन रही थी,” वह बताती हैं। उनका अनुभव उन सैकड़ों लोगों जैसा है, जो रोज़ाना घंटों स्क्रीन के सामने बैठकर काम करते हैं और धीरे-धीरे इससे पैदा होने वाली थकान महसूस करने लगे हैं।

डॉक्टरों की मानें तो स्क्रीन ओवरलोड की वजह से नींद का बिगड़ना, ध्यान कम होना और लगातार चिड़चिड़ापन अब आम शिकायतें बन गई हैं। दिल्ली के एक मनोचिकित्सक के अनुसार, “लोग पहले समझ नहीं पाते कि परेशानी कहाँ से आ रही है, लेकिन फोन दूर रखते ही मानसिक दबाव थोड़ा-थोड़ा कम होता महसूस होता है।”

इसीलिए कई लोग सप्ताह में एक तय दिन या कुछ घंटे ‘ऑफलाइन’ रखने लगे हैं। कुछ परिवारों ने रात के खाने के समय फोन को साइलेंट मोड में रखना शुरू किया है। वहीं कॉलेज छात्र कहते हैं कि पढ़ाई के दौरान फोन को कमरे से बाहर रखना अब एक जरूरी शर्त बन गई है।

यह बदलाव किसी बड़े अभियान या जागरूकता कार्यक्रम से नहीं आया है। यह धीरे-धीरे उन छोटी-छोटी बातों से पनपा है, जिनमें लोग महसूस करते हैं कि बिना स्क्रीन के बिताया गया एक सादा-सा पल भी दिन को हल्का बना देता है। शाम के समय टहलना, बिना किसी ऐप के संगीत सुनना, या बस खिड़की खोलकर हवा को महसूस करना-लोग इन सरल अनुभवों की ओर लौट रहे हैं।

डिजिटल डिटॉक्स तकनीक से दूर भागने की कोशिश नहीं, बल्कि अपनी गति को फिर से पहचानने की प्रक्रिया है। हर व्यक्ति इसे अपने तरीके से अपनाता है-किसी के लिए यह एक घंटे का विराम है, तो किसी के लिए पूरे सप्ताहांत की ऑफलाइन योजना। लेकिन उद्देश्य एक ही है-लगातार भागती दुनिया के बीच एक शांत कोना बनाना।

आने वाले समय में यह बदलाव कितना बड़ा आकार लेगा, यह कहना मुश्किल है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि डिजिटल थकान अब सिर्फ चर्चा का विषय नहीं, बल्कि बदलते शहरी जीवन का हिस्सा बन चुका है।

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