गार्ड ऑफ ऑनर के साथ विदा हुए विनोद शुक्ल: बेटे ने दी मुखाग्नि, सीएम ने दिया कंधा

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गार्ड ऑफ ऑनर के साथ विदा हुए विनोद शुक्ल: बेटे ने दी मुखाग्नि, सीएम ने दिया कंधा

गार्ड ऑफ ऑनर के साथ विदा हुए विनोद शुक्ल बेटे ने दी मुखाग्नि सीएम ने दिया कंधा

Vinod Shukla Last Rites: हिंदी साहित्य की दुनिया आज कुछ ज्यादा ही खामोश है। शब्दों को बेहद सादगी और गहराई से रचने वाले वरिष्ठ कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल अब हमारे बीच नहीं रहे। मंगलवार शाम 88 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली। बुधवार को रायपुर के मारवाड़ी श्मशान घाट में पूरे राजकीय सम्मान और गार्ड ऑफ ऑनर के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।उनके बेटे शाश्वत शुक्ल ने मुखाग्नि दी, जबकि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने पार्थिव शरीर को कंधा देकर श्रद्धांजलि अर्पित की।

Vinod Shukla Last Rites: अंतिम यात्रा में साहित्य और राजनीति साथ

विनोद शुक्ल की अंतिम यात्रा में साहित्य, संस्कृति और राजनीति-तीनों जगत की उपस्थिति दिखी। प्रसिद्ध कवि कुमार विश्वास भी अंतिम यात्रा में शामिल हुए। श्मशान घाट तक पहुंचते-पहुंचते माहौल पूरी तरह मौन हो गया था। हर चेहरा उनके शब्दों और रचनाओं को याद करता नजर आया।

Vinod Shukla Last Rites: गार्ड ऑफ ऑनर के साथ अंतिम विदाई

छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। यह सम्मान न सिर्फ उनके साहित्यिक योगदान का प्रतीक था, बल्कि उस शांत और विनम्र व्यक्तित्व का भी, जिसने कभी मंचों पर शोर नहीं मचाया, लेकिन पाठकों के मन में गहरी जगह बनाई।

एक महीने पहले मिला था ज्ञानपीठ सम्मान

यह संयोग भी अपने-आप में भावुक कर देने वाला है कि महज एक महीने पहले ही विनोद कुमार शुक्ल को देश के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान—ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे शुक्ल का इलाज एम्स रायपुर में चल रहा था। उनकी रचनाएं-कविता हो, कहानी या उपन्यास—हमेशा साधारण जीवन में छिपी असाधारण संवेदना को सामने लाती रहीं।

प्रधानमंत्री ने जताया शोक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनके निधन पर शोक व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात लेखक विनोद कुमार शुक्ल का निधन अत्यंत दुःखद है और हिंदी साहित्य में उनके अमूल्य योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा।

शब्दों में सादगी, विचारों में गहराई

विनोद कुमार शुक्ल उन लेखकों में थे, जिनकी भाषा कभी बोझिल नहीं लगी। उनकी रचनाओं में न तो दिखावा था, न शोर—बस जीवन की सहज सच्चाई थी। उनकी विदाई के साथ हिंदी साहित्य ने एक बेहद संवेदनशील आवाज खो दी है।

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