मध्यप्रदेश में करीब नौ साल बाद छात्रसंघ चुनाव होने की उम्मीद तो जगी, लेकिन सितंबर खत्म होने को है और अब तक चुनाव का कोई स्पष्ट कार्यक्रम सामने नहीं आया है। सरकार ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में शैक्षणिक सत्र 2026-27 के अकादमिक कैलेंडर के आधार पर सितंबर 2026 में छात्रसंघ चुनाव कराने की बात कही थी। इसके बाद छात्रों और छात्र संगठनों में चुनाव को लेकर उम्मीद बढ़ी थी।
2017 में हुए थे आखिरी चुनाव
मध्यप्रदेश में कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर आखिरी बार छात्रसंघ चुनाव 2017 में हुए थे। इसके बाद लगातार चुनाव नहीं हो सके। ऐसे में अगर 2026 में चुनाव होते हैं तो करीब नौ साल बाद कैंपस में चुनावी छात्र राजनीति की वापसी होगी। फिलहाल सितंबर का अधिकांश समय बीत चुका है और चुनाव की तारीख, प्रक्रिया या विस्तृत कार्यक्रम को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।
अब छात्रों के सामने बड़ा सवाल
छात्रों के बीच अब सवाल उठ रहा है कि क्या उन्हें इस बार अपना प्रतिनिधि चुनने का मौका मिलेगा। सितंबर खत्म होने के बाद त्योहारी सीजन भी शुरू होगा। ऐसे में यदि जल्द प्रक्रिया शुरू नहीं होती है तो चुनाव आगे खिसकने की आशंका को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। छात्रों की नजर अब सरकार और उच्च शिक्षा विभाग की अगली घोषणा पर है।
छात्रसंघ चुनाव का पुराना इतिहास
देश के विश्वविद्यालयों में छात्र प्रतिनिधित्व की व्यवस्था आजादी के आसपास विकसित होने लगी थी। दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्र प्रतिनिधि संगठन के गठन का प्रस्ताव 6 अगस्त 1947 को सामने आया और बाद में DUSU का गठन हुआ। छात्र राजनीति का विस्तार धीरे-धीरे देश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों तक हुआ और छात्रसंघ चुनाव कैंपस लोकतंत्र का हिस्सा बन गए।
ABVP और NSUI की चुनावी भूमिका
ABVP के अनुसार संगठन ने 1970 में उत्तर प्रदेश में छात्रसंघ या स्टूडेंट काउंसिल चुनावों में भाग लेना शुरू किया था। वहीं NSUI की स्थापना 9 अप्रैल 1971 को हुई। कांग्रेस के अनुसार केरल स्टूडेंट्स यूनियन और पश्चिम बंगाल की छात्र परिषद के विलय के बाद राष्ट्रीय स्तर पर NSUI का गठन किया गया। इसके बाद दोनों संगठनों की छात्र राजनीति में सक्रिय भूमिका रही है।
छात्र मुद्दों के प्रतिनिधित्व का सवाल
छात्रसंघ चुनाव केवल पद हासिल करने तक सीमित नहीं माने जाते। निर्वाचित प्रतिनिधियों के जरिए फीस, परीक्षा, रिजल्ट, हॉस्टल, लाइब्रेरी, कैंपस सुरक्षा और छात्र सुविधाओं से जुड़े मुद्दे प्रशासन तक पहुंचाए जाते हैं। चुनाव छात्रों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी और नेतृत्व का अनुभव भी देते हैं।
ABVP और NSUI आमने-सामने
मध्यप्रदेश में ABVP और NSUI छात्रसंघ चुनाव जल्द कराने की मांग कर रहे हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव कुणाल चौधरी ने चुनाव में देरी को लेकर सरकार पर सवाल उठाते हुए इसे भाजपा की चिंता से जोड़ा। भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों का पलटवार करते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव परिणाम का हवाला दिया और कहा कि देश का जनसमर्थन भाजपा के साथ है।
सितंबर खत्म, चुनाव पर अब भी सस्पेंस
करीब नौ साल बाद छात्रसंघ चुनाव की उम्मीद ने कैंपस में राजनीतिक गतिविधियों को फिर चर्चा में ला दिया है। हालांकि सितंबर में चुनाव कराने की बात सामने आने के बावजूद अब तक कोई स्पष्ट शेड्यूल जारी नहीं हुआ है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मध्यप्रदेश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में इस साल छात्र अपने प्रतिनिधि चुन पाएंगे या फिर चुनाव का इंतजार एक बार फिर लंबा होगा।