महाराष्ट्र में कम बारिश और लंबे समय से बने सूखे के हालात के बीच राज्य सरकार ने 358 में से 265 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया है। इसके बाद कांग्रेस ने सरकार की प्राथमिकताओं को लेकर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस ने डेटा सेंटर उद्योग के विस्तार और जल संकट के बीच संबंध को लेकर चिंता जताते हुए पूछा है कि पानी के इस्तेमाल में किसानों को प्राथमिकता मिलेगी या उद्योगों को।
डेटा सेंटर निवेश पर कांग्रेस का सवाल
कांग्रेस के राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली सरकार पर सवाल उठाए। खेड़ा ने दावा किया कि महाराष्ट्र में डेटा सेंटर उद्योग के विस्तार के लिए बड़े स्तर पर निवेश आकर्षित किया गया है और 2032 तक 5.7 गीगावॉट डेटा सेंटर क्षमता का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने कहा कि डेटा सेंटर के संचालन में बिजली के साथ पानी भी महत्वपूर्ण संसाधन है।
पानी के इस्तेमाल को लेकर चिंता
पवन खेड़ा ने कहा कि डेटा सेंटर में पानी की जरूरत इस्तेमाल की जाने वाली कूलिंग तकनीक पर निर्भर करती है। उन्होंने रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि सरकार नगर निगमों के सीवेज को ट्रीट कर उसे महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम यानी MIDC के जरिए और शुद्ध करने तथा इसके बाद डेटा सेंटर और दूसरे उद्योगों को उपलब्ध कराने की योजना पर काम कर रही है।
किसानों के लिए भी पुनर्चक्रित पानी की मांग
कांग्रेस ने सवाल उठाया कि यदि उद्योगों के लिए सीवेज ट्रीटमेंट और पानी के पुनर्चक्रण की व्यवस्था तैयार की जा सकती है, तो किसानों के लिए ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं विकसित की जा रही। खेड़ा ने पूछा कि जल संकट से जूझ रहे महाराष्ट्र में पानी के संसाधनों के इस्तेमाल में किसानों और उद्योगों के बीच सरकार की प्राथमिकता क्या होगी।
मराठवाड़ा में बारिश की भारी कमी
मौसम के आंकड़ों के अनुसार महाराष्ट्र में कुल मिलाकर सामान्य से करीब 18 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। मराठवाड़ा में बारिश की कमी करीब 38 प्रतिशत और विदर्भ में 27 प्रतिशत बताई गई है। क्षेत्रवार बारिश की कमी ने कई इलाकों में खेती और जल उपलब्धता को प्रभावित किया है।
सोयाबीन उत्पादन पर भी असर
कम बारिश का असर खरीफ फसलों पर भी दिखाई देने की बात कही जा रही है। व्यापारियों के अनुमान के मुताबिक मराठवाड़ा में इस साल सोयाबीन उत्पादन सामान्य के मुकाबले 40 से 50 प्रतिशत और विदर्भ में करीब 60 से 70 प्रतिशत तक रह सकता है। ऐसे में सूखे के बीच पानी के वितरण और कृषि संकट को लेकर महाराष्ट्र में राजनीतिक बहस तेज हो गई है।