उज्जैन के सेवाधाम आश्रम में रह रहे एक हजार से ज्यादा दिव्यांग और मानसिक रूप से बीमार लोगों की स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने अहम आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि समाज के सबसे कमजोर वर्ग से आने वाले इन लोगों को लगातार चिकित्सा निगरानी और उपचार की जरूरत है। इनकी स्वास्थ्य व्यवस्था को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
आश्रम में डॉक्टर और नर्सिंग केयर यूनिट के निर्देश
हाईकोर्ट ने राज्य शासन को सेवाधाम आश्रम में कम से कम एक डॉक्टर और नर्सिंग केयर यूनिट स्थापित करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने इसके लिए शासन को दो सप्ताह का समय दिया है। साथ ही 21 अक्टूबर को होने वाली अगली सुनवाई में इस संबंध में की गई कार्रवाई की रिपोर्ट पेश करने को कहा है।
एक साल में 17 बच्चों की मौत के बाद स्वत: संज्ञान
सेवाधाम आश्रम में एक वर्ष के दौरान 17 बच्चों की मौत की जानकारी सामने आने के बाद हाईकोर्ट ने मामले का स्वत: संज्ञान लिया था। इसके बाद जनहित याचिका पर सुनवाई शुरू हुई। कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता अमित एस. अग्रवाल को न्याय मित्र नियुक्त किया। उन्होंने आश्रम का दौरा कर अपनी रिपोर्ट कोर्ट के सामने पेश की।
आश्रम में नियमित डॉक्टर नहीं होने की बात सामने आई
न्याय मित्र की रिपोर्ट में बताया गया कि सेवाधाम आश्रम में कोई नियमित डॉक्टर नहीं है। डॉक्टर के आने पर उनकी मौजूदगी में मरीजों की जांच कर दवाएं दी जाती हैं। आश्रम में बड़ी संख्या दिव्यांग और मानसिक रूप से बीमार लोगों की है, जिन्हें लगातार निगरानी और उपचार की आवश्यकता होती है।
वृद्धाश्रम के रूप में पंजीकृत है सेवाधाम
शासन ने अपने जवाब में बताया कि सेवाधाम आश्रम का पंजीयन वृद्धाश्रम के रूप में है, मेडिकल सेंटर के तौर पर नहीं। इसी कारण वहां नियमित डॉक्टर और नर्सिंग केयर यूनिट की व्यवस्था नहीं है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब एक समय में एक हजार से ज्यादा लोग आश्रम में रहते हैं, तो उनकी चिकित्सा जरूरतों को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है।
सरकार की भी है स्वास्थ्य सुविधा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी
हाईकोर्ट ने सेवाधाम द्वारा दिव्यांग और मानसिक रूप से चुनौतीपूर्ण लोगों की सेवा को सराहनीय माना। कोर्ट ने कहा कि गरीब और असहाय मरीजों की जिंदगी केवल किसी व्यक्ति की दया पर निर्भर नहीं रह सकती। उनकी चिकित्सा सुविधा सुनिश्चित करना राज्य सरकार की भी जिम्मेदारी है।