भोपाल में आयुष्मान योजना के तहत मरीजों का इलाज करने वाले प्राइवेट अस्पतालों के डॉक्टर और संचालक बुधवार को प्रदर्शन के लिए सड़क पर उतर आए। प्राइवेट हॉस्पिटल एसोसिएशन के बैनर तले अस्पताल संचालक जेपी हॉस्पिटल कैंपस स्थित आयुष्मान योजना के कार्यालय पहुंचे। यहां उन्होंने नारेबाजी करते हुए पिछले 5 से 6 महीने से लंबित भुगतान जल्द जारी करने की मांग की। अस्पताल संचालकों का कहना है कि भुगतान नहीं मिलने के कारण दवाइयों के वेंडर्स और अस्पताल के स्टाफ का भुगतान करने में भी परेशानी आ रही है।
468 अस्पतालों का करोड़ों का भुगतान बाकी
यूनाइटेड प्राइवेट हॉस्पिटल एसोसिएशन के उपाध्यक्ष डॉ. धनंजय मिश्रा के अनुसार भोपाल में करीब 468 प्राइवेट अस्पताल आयुष्मान योजना से जुड़े हैं। एसोसिएशन का दावा है कि प्रत्येक अस्पताल का औसतन डेढ़ से दो करोड़ रुपए तक का भुगतान बकाया है। अस्पताल संचालकों ने मांग की है कि आयुष्मान योजना के तहत निजी अस्पतालों की लंबित राशि का तत्काल भुगतान किया जाए। उनका कहना है कि लंबे समय से पैसा नहीं मिलने के कारण अस्पतालों की रोजमर्रा की व्यवस्थाओं पर असर पड़ रहा है।
NABH की अनिवार्यता को लेकर विवाद
प्रदर्शन के दौरान अस्पताल संगठनों ने NABH की अनिवार्यता को लेकर भी विरोध जताया। अस्पताल संचालकों के मुताबिक आयुष्मान योजना से जुड़े अस्पतालों के लिए NABH सर्टिफिकेशन की शर्त लागू की जा रही है। संगठनों का कहना है कि वे अस्पतालों में गुणवत्ता मानकों के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन NABH को स्वैच्छिक और प्रोत्साहन आधारित रखा जाना चाहिए। अस्पताल के आकार, बेड संख्या और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार व्यावहारिक मानक तय करने की मांग की गई है।
1 अक्टूबर से डी-एम्पैनलमेंट की आशंका
अस्पताल संगठनों का कहना है कि उन्हें विभागीय स्तर से जानकारी मिल रही है कि 1 अक्टूबर से भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर में बड़ी संख्या में अस्पतालों को आयुष्मान योजना से डी-एम्पैनल किया जा सकता है। हालांकि, संभावित कार्रवाई से संबंधित अस्पतालों की अंतिम आधिकारिक सूची या आदेश अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है। अस्पताल संचालकों का कहना है कि यदि बड़ी संख्या में अस्पताल योजना से बाहर होते हैं तो आयुष्मान मरीजों के इलाज पर इसका असर पड़ सकता है।
छोटे और मध्यम अस्पतालों को लेकर चिंता
अस्पताल संचालकों के अनुसार NABH प्रक्रिया में अस्पताल की व्यवस्था, स्टाफ, सुविधाओं, लैब और अन्य संसाधनों का आकलन किया जाता है। उनका कहना है कि इस प्रक्रिया के कारण कई छोटे और मध्यम अस्पताल आयुष्मान योजना के दायरे से बाहर हो सकते हैं। ऐसे में उन गरीब और मध्यमवर्गीय मरीजों के सामने परेशानी खड़ी हो सकती है, जो अपने घर के नजदीक निजी अस्पतालों में आयुष्मान योजना के तहत कैशलेस इलाज करा रहे हैं।
सरकार से हस्तक्षेप की मांग
निजी अस्पताल संगठनों ने राज्य सरकार से पूरे मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की है। उनका कहना है कि बड़े स्तर पर डी-एम्पैनलमेंट से पहले अस्पताल संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक कर व्यावहारिक समाधान निकाला जाना चाहिए। साथ ही आयुष्मान योजना का लंबित भुगतान भी जल्द जारी किया जाए। अस्पताल संचालकों ने कहा कि उनका विरोध गुणवत्ता सुधार के खिलाफ नहीं, बल्कि अनिवार्य NABH शर्त के कारण पैदा हो रही परेशानियों को लेकर है।
कार्रवाई हुई तो प्रदेशभर में आंदोलन
अस्पताल संचालकों ने चेतावनी दी है कि यदि 1 अक्टूबर को बड़े पैमाने पर डी-एम्पैनलमेंट की कार्रवाई होती है तो प्रदेशभर के निजी अस्पताल संगठन सामूहिक आंदोलन कर सकते हैं। संगठनों का कहना है कि यदि बड़ी संख्या में अस्पताल आयुष्मान नेटवर्क से बाहर होते हैं तो मरीजों का अतिरिक्त भार सरकारी और बचे हुए सूचीबद्ध अस्पतालों पर बढ़ सकता है। इसलिए सरकार से भुगतान और NABH दोनों मुद्दों पर जल्द समाधान की मांग की गई है।