भोपाल/बालाघाट। कभी नक्सलवाद से ग्रस्त रहे मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले की तस्वीर अब पूरी तरह बदल गई। बालाघाट के उन जंगलों में, जहां कुछ समय पहले तक सरकार की मौजूदगी महसूस करना भी मुश्किल था, आज सरकारी अमला पहुंच रहा है। सड़क के रास्ते स्वास्थ्यकर्मी गांवों तक जा रहे हैं, बच्चों की जांच हो रही है और प्रशासन उन परिवारों तक पहुंचने की कोशिश कर रहा है, जो दशकों तक मुख्यधारा से कटे रहे। लेकिन, इस बदलाव के साथ एक ऐसी तस्वीर भी सामने आई है, जिसने पूरे सिस्टम के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जब 36 साल तक किसी क्षेत्र में नियमित सरकारी व्यवस्था नहीं पहुंचती, तो वहां सिर्फ सड़क और अस्पताल ही पीछे नहीं छूटते, जागरूकता भी पीछे छूट जाती है। हाल ही में क्षेत्र में 25 से अधिक बच्चों की मौत और बीमारी की गंभीर स्थिति सामने आई। यह सिर्फ एक स्वास्थ्य संकट नहीं था। यह उन दशकों का परिणाम भी दिखाई देता है, जिसमें नक्सल प्रभाव के कारण सामान्य प्रशासनिक और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बेहद सीमित रही।
आज प्रशासन की टीम जब वहां पहुंच रही है, तो उसे केवल बीमार बच्चों का इलाज नहीं करना है। उसे एक पूरी पीढ़ी को यह समझाना है कि सरकारी अस्पताल डरने की जगह है नहीं, मदद लेने की जगह है। डॉक्टर दुश्मन नहीं, इलाज करने वाला व्यक्ति है और सरकारी व्यवस्था से जुड़ना अधिकार है। यही कारण है कि हाल ही में कलेक्टर और प्रशासन की सक्रियता से करीब 300 बच्चों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने और उनकी जान बचाने का प्रयास किया गया। यह संख्या सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है। यह उस बदलाव का संकेत है जिसमें वर्षों से अलग-थलग रहा एक क्षेत्र धीरे-धीरे प्रशासन की पहुंच में आ रहा है। बंदूक और विकास के बीच का फर्क ग्राउंड पर इस फर्क को समझना मुश्किल नहीं है। एक तरफ वह दौर था जब सुरक्षा और नक्सल प्रभाव के कारण स्वास्थ्यकर्मी तक नियमित रूप से नहीं पहुंच पाते थे। दूसरी तरफ आज प्रशासन है, जो उसी क्षेत्र में जाकर बच्चों की जांच कर रहा है और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहा है। एक व्यवस्था लोगों को डर और अलगाव में रखती है। दूसरी व्यवस्था उन्हें अस्पताल, स्कूल, सड़क, राशन, रोजगार और अधिकारों से जोड़ती है। इसीलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि नक्सलवाद खत्म हुआ या नहीं। असली सवाल यह है कि नक्सलवाद से मुक्त हुए इन इलाकों को विकास की मुख्यधारा में कितनी तेजी से लाया जा सकता है।
सरकार के सामने बड़ी चुनौती
मध्य प्रदेश सरकार, छत्तीसगढ़ सरकार और केंद्र सरकार के संयुक्त प्रयासों से क्षेत्र नक्सल प्रभाव से बाहर आया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का हालिया दौरा भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है कि अब इन इलाकों को बाकी क्षेत्रों की तरह विकास की मुख्यधारा में लाने पर जोर है। लेकिन चुनौती बड़ी है। कई इलाके लंबे समय तक अलगाव में रहने के कारण दूसरे क्षेत्रों की तुलना में वर्षों पीछे रह गए हैं। यहां सिर्फ सड़क बना देना पर्याप्त नहीं होगा। स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, रोजगार, डिजिटल कनेक्टिविटी और सरकारी योजनाओं की जानकारी इन सभी मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा। लेकिन, सरकार अकेले यह बदलाव नहीं कर सकती यहां एक दूसरी जिम्मेदारी भी सामने आती है, स्थानीय समाज की। जब कोई क्षेत्र वर्षों के अलगाव के बाद मुख्यधारा में लौटता है, तो वहां अफवाहों और गलत सूचनाओं का असर सामान्य क्षेत्रों की तुलना में कहीं ज्यादा हो सकता है।
सरकार की योजनाओं पर सवाल उठाना लोकतंत्र का हिस्सा है। सरकार से जवाब मांगना भी जरूरी है। लेकिन यदि किसी अफवाह के कारण कोई परिवार अस्पताल जाने से डरने लगे, बच्चों का इलाज रुक जाए या लोग सरकारी कर्मचारियों से दूरी बनाने लगें, तो नुकसान अंततः उसी परिवार और उसी बच्चे का होता है। इसलिए इस समय सबसे जरूरी है भरोसा बनाना। सरकार को पारदर्शिता के साथ काम करना होगा। प्रशासन को लगातार गांवों तक पहुंचना होगा। स्वास्थ्यकर्मियों को लोगों के बीच विश्वास पैदा करना होगा। और स्थानीय लोगों को भी अफवाहों से सावधान रहकर सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाना होगा।
अब लक्ष्य सिर्फ नक्सल मुक्त बालाघाट नहीं
बालाघाट के लिए अगला लक्ष्य केवल नक्सलवाद से मुक्ति नहीं होना चाहिए। लक्ष्य होना चाहिए ऐसा बालाघाट जहां किसी बच्चे की मौत सिर्फ इसलिए न हो कि अस्पताल बहुत दूर था, जहां कोई परिवार इलाज से इसलिए न डरे क्योंकि उसे सरकारी व्यवस्था पर भरोसा नहीं है और जहां कोई गांव विकास से सिर्फ इसलिए पीछे न रह जाए क्योंकि वह कभी नक्सल प्रभावित रहा था। अब उस दरवाजे से सरकार को विकास लेकर अंदर जाना है और वहां के लोगों को भरोसे के साथ मुख्यधारा में आगे बढ़ना है। क्योंकि नक्सलवाद किसी क्षेत्र को सिर्फ सुरक्षा की समस्या नहीं देता वह विकास के वर्षों छीन लेता है। और उन वर्षों की भरपाई बंदूक से नहीं, लगातार सरकारी पहुंच और लोगों की भागीदारी से ही हो सकती है।
नक्सल मुक्त बालाघाट में विकास एक नई चुनौती: पहली सफलता और आगे का रास्ता
बालाघाट से लौटकर ललित मुद्गल: बालाघाट की हालिया तस्वीरें सिर्फ स्वास्थ्य संकट की कहानी नहीं बतातीं। ये दिखाती हैं कि दशकों तक विकास से कटे रहने के कितने गंभीर परिणाम हो सकते हैं। मध्य प्रदेश के पूर्व नक्सल प्रभावित बालाघाट जिले के बैगा और गोंड बहुल गांवों में हाल के महीनों में 25 से अधिक बच्चों की मौत हुई है। खसरा, मलेरिया, कुपोषण और अन्य बीमारियों का प्रकोप फैला। इस स्थिति को सरकार की पहली सफलता कहा जाएगा क्योंकि यह वही इलाका है जहां 36 साल तक स्वास्थ्यकर्मियों की पहुंच ही नहीं थी। किसी को नहीं पता इन 36 सालों में कितने बच्चों का क्या हुआ।
नक्सल मुक्त बालाघाट की तस्वीर बदल रही है
अब स्थिति बदल रही है। मध्य प्रदेश सरकार, छत्तीसगढ़ सरकार और केंद्र सरकार के संयुक्त प्रयासों से यह क्षेत्र नक्सलवाद से मुक्त हो चुका है। हाल ही में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव स्वयं प्रभावित गांवों में पहुंचे। उन्होंने क्षेत्र को विकास की मुख्यधारा में लाने की बात कही और 225 करोड़ रुपये के विकास पैकेज की घोषणा की। जिला प्रशासन की सक्रियता से सैकड़ों बच्चों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाई गईं और कई जानें बचाई गईं। स्वास्थ्य टीमें अब उन गांवों तक जा रही हैं जहां पहले जाना मुश्किल था। पूरे 36 सालों के बाद पहली बार यह लोग अस्पताल आए हैं।
नई चुनौतियां सामने आईं
दशकों बाद जब कोई नक्सल प्रभावित क्षेत्र मुख्यधारा में आता है, तो स्वास्थ्य के साथ-साथ जागरूकता, शिक्षा, सरकारी योजनाओं की जानकारी और बुनियादी सुविधाओं की कमी भी साफ दिखती है। कुछ गांव दूसरे क्षेत्रों की तुलना में कई वर्ष पीछे रह गए हैं। इसे बदलना अब सरकार के सामने बड़ी चुनौती है। इन क्षेत्रों को जल्द से जल्द सामान्य क्षेत्रों के बराबर लाना होगा। सड़क, अस्पताल, स्कूल, रोजगार, इंटरनेट, प्रशासनिक सेवाएं और सरकारी योजनाओं की पहुंच हर परिवार तक सुनिश्चित करनी होगी।
नक्सलवाद बनाम सरकार: क्या फर्क है?
नक्सलवाद क्या देता है- डर, बंदूक, अलगाव, सरकारी व्यवस्था से दूरी और विकास के रास्ते में बाधा। सरकार क्या देती है- अस्पताल, डॉक्टर, स्कूल, सड़क, राशन, रोजगार, प्रशासन और नागरिकों को उनके अधिकारों तक पहुंच। मान लीजिए किसी गांव में बच्चा बीमार है। नक्सल प्रभाव वाले दौर में डॉक्टर गांव तक नहीं पहुंच सकता और परिवार अस्पताल नहीं जा सकता। बीमारी जानलेवा बन जाती है। जब क्षेत्र सुरक्षित होता है, प्रशासन पहुंचता है और स्वास्थ्य व्यवस्था जुड़ती है, तो उसी बच्चे को समय पर इलाज मिल सकता है। बंदूक किसी समस्या का समाधान नहीं करती। सड़क और अस्पताल करते हैं। इस समय क्षेत्र को सबसे ज्यादा जरूरत है सरकारी मदद, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, रोजगार और मुख्यधारा से दोबारा जुड़ने की। सरकार इस दिशा में काम कर रही है। लेकिन चुनौती सिर्फ विकास की नहीं, भरोसा और जागरूकता वापस बनाने की भी है। दुर्भाग्य से ऐसे संवेदनशील इलाकों में आज भी अफवाहें फैलाने और लोगों को सरकारी व्यवस्था के खिलाफ भड़काने की कोशिशें होती हैं। ऐसे प्रयासों से वर्षों तक अलगाव झेल चुके लोगों में फिर से डर और अविश्वास पैदा हो सकता है।
जिम्मेदारी दोनों तरफ की है
सरकार की जिम्मेदारी जितनी बड़ी है, उतनी ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी वहां के रहवासियों की भी है। सरकार के काम में कमी है तो सवाल पूछिए। पैकेज का हिसाब मांगिए। जहां काम नहीं हुआ, वहां आवाज उठाइए। लेकिन अफवाहों पर भरोसा मत कीजिए। उन लोगों या संगठनों से दूरी रखिए जो आपको फिर से मुख्यधारा से दूर करने या सरकारी सुविधाओं से डराने का काम करते हैं। मुख्यधारा में लौटना सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। वहां के लोगों को भी तय करना होगा कि उनके बच्चों का भविष्य शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास में है, अलगाव और हिंसा में नहीं। जब लोग सरकार की योजनाओं से जुड़ेंगे, अपने अधिकारों को समझेंगे और गलत सूचना से बचेंगे, तभी वे अपने अधिकारों की बेहतर रक्षा कर पाएंगे और क्षेत्र के विकास में भागीदार बन पाएंगे। 36 साल के अलगाव के बाद अब समय है उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने का। सरकार विकास का रास्ता तैयार करे और समाज उस रास्ते पर आगे बढ़े। तभी बालाघाट की यह नई शुरुआत वास्तव में स्थायी बदलाव में बदलेगी। नक्सलवाद से नहीं, सरकार और समाज के साथ मिलकर ही इस क्षेत्र का भविष्य बदलेगा।