सुभाष चंद्रा NCLT केस अपडेट
एक्सक्लूसिव

सुभाष चंद्रा को NCLT से मिली बड़ी राहत, केवल 0.03% वसूली की अनुमति

NCLT ने सुभाष चंद्रा के ₹22,000 करोड़ के दिवालियापन मामले में पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दी, जिससे लेनदारों को केवल 0.03% वसूली मिलेगी।

By : शुभ लाभ
सुभाष चंद्रा को NCLT से मिली बड़ी राहत, केवल 0.03% वसूली की अनुमति

सुभाष चंद्रा NCLT केस: ₹22,000 करोड़ के दिवालिया मामले में फैसले की पूरी कहानी

एस्सेल ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा गोयनका को व्यक्तिगत दिवालियापन मामले में एक बड़ी राहत मिली है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने एक पुनर्भुगतान योजना को मंज़ूरी दी है, जिसके तहत लगभग ₹22,006.57 करोड़ के स्वीकृत दावों के बदले केवल ₹6.5 करोड़ का भुगतान किया जाएगा — यानी लेनदारों को महज़ लगभग 0.03% वसूली मिलेगी। आइए जानते हैं इस पूरे मामले, फैसले और आगे क्या होगा, इसकी पूरी जानकारी।

मामले का सार

नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल ने ज़ी ग्रुप/एस्सेल ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा के खिलाफ चल रही व्यक्तिगत दिवालियापन कार्यवाही में एक पुनर्भुगतान योजना को स्वीकृति दे दी है। इस योजना के तहत लेनदारों को कुल मिलाकर लगभग ₹6.25 करोड़ मिलेंगे, साथ ही दिवालियापन प्रक्रिया की लागत के लिए लगभग ₹25 लाख अलग से दिए जाएंगे — यह सब लगभग ₹22,006.57 करोड़ के कुल स्वीकृत दावों के मुकाबले है। इसका मतलब है कि लेनदारों को करीब 99.97% का नुकसान (हेयरकट) उठाना पड़ेगा।

यह आदेश NCLT के सदस्य (न्यायिक) नीलेश शर्मा ने पारित किया, जिन्हें तीसरे सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया था ताकि मूल दो-सदस्यीय पीठ के बीच बने गतिरोध को तोड़ा जा सके, क्योंकि इस योजना को मंज़ूरी देने को लेकर पीठ में मतभेद था।

मामले की शुरुआत कैसे हुई

यह कार्यवाही 2022 में शुरू हुई थी, जब इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (IBHF) — जिसे अब सम्मान कैपिटल के नाम से जाना जाता है — ने दिवालियापन एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) की धारा 95 के तहत NCLT का रुख किया और चंद्रा के खिलाफ दिवालियापन कार्यवाही शुरू करने की मांग की। चंद्रा ने विवेक इन्फ्राकॉन को दिए गए ₹170 करोड़ के ऋण की व्यक्तिगत गारंटी दी थी। विवेक इन्फ्राकॉन एस्सेल ग्रुप से जुड़ी एक कंपनी है। जब यह ऋण एनपीए (डूबा हुआ कर्ज) बन गया, तो इंडियाबुल्स ने चंद्रा की व्यक्तिगत गारंटी को लागू करते हुए उनके खिलाफ व्यक्तिगत हैसियत से ट्रिब्यूनल का दरवाज़ा खटखटाया।

यह याचिका 2024 में औपचारिक रूप से स्वीकार कर ली गई, जिससे चंद्रा के खिलाफ व्यक्तिगत गारंटर के रूप में पूर्ण दिवालियापन समाधान प्रक्रिया शुरू हो गई। यह प्रक्रिया IBC के तहत कॉर्पोरेट दिवालियापन से अलग है और उन व्यक्तियों पर लागू होती है जिन्होंने कॉर्पोरेट कर्ज़ की गारंटी दी हो।

दावे ₹22,000 करोड़ तक कैसे पहुँचे

₹22,006.57 करोड़ की राशि ऐसी नहीं है जिसे चंद्रा ने खुद उधार लिया हो। यह राशि दरअसल उन दावों की कुल कीमत दर्शाती है जो विभिन्न ऋणदाताओं ने चंद्रा के खिलाफ, एस्सेल/ज़ी ग्रुप से जुड़ी कई कंपनियों के ऋण के व्यक्तिगत गारंटर के रूप में, स्वीकार करवाए हैं। एक व्यक्तिगत गारंटर वह होता है जो यह वचन देता है कि यदि मूल कर्ज़दार भुगतान करने में असफल रहता है, तो वह खुद उस बकाया राशि का भुगतान करेगा। एक बार दिवालियापन कार्यवाही स्वीकार हो जाने के बाद, ऐसी गारंटी रखने वाले सभी ऋणदाता गारंटर के खिलाफ अपने दावे दर्ज करा सकते हैं — यही वजह है कि यह आँकड़ा समूह से जुड़े विभिन्न कर्ज़ों में ₹22,000 करोड़ से अधिक तक पहुँच गया।

सरकारी सूत्रों ने इस मामले को लेकर बनी कुछ धारणाओं पर सफाई भी दी है। उनके अनुसार, स्वीकृत दावों में से केवल लगभग ₹2,574 करोड़ के दावे ऐसे हैं जो उन गारंटियों से संबंधित हैं जो चंद्रा ने मूल ऋण वितरण के समय दी थीं, जबकि बाकी अधिकांश गारंटियाँ बाद में मौजूदा कर्ज़ के लिए अतिरिक्त सुरक्षा के तौर पर जोड़ी गई थीं।

विभाजित फैसला और तीसरे सदस्य की नियुक्ति

अंतिम फैसले से पहले, इस मामले की सुनवाई कर रही NCLT की दो-सदस्यीय पीठ — न्यायिक सदस्य अशोक कुमार भारद्वाज और तकनीकी सदस्य रीना सिन्हा पुरी — इस बात पर सहमत नहीं हो पाई कि पुनर्भुगतान योजना को मंज़ूरी दी जाए या नहीं, जिसके चलते फैसला विभाजित हो गया। IBC की प्रक्रिया के अनुसार, ऐसी स्थिति में ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष ने गतिरोध तोड़ने के लिए तीसरे सदस्य के रूप में नीलेश शर्मा को नियुक्त किया।

एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस, एचडीएफसी बैंक, एक्सिस बैंक, केनरा बैंक, आरबीएल बैंक और यूनियन बैंक सहित कई बड़े ऋणदाताओं ने इस योजना पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। उनका तर्क था कि स्वीकृत दावों के आकार को देखते हुए यह समझौता राशि बेहद कम है। एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस ने विशेष रूप से इस प्रस्तावित भुगतान को "अव्यावहारिक और कानूनी रूप से अस्थिर" बताया था।

फैसला: NCLT ने वास्तव में क्या तय किया

तीसरे सदस्य ने IBC की धारा 114 के तहत इस योजना को मंज़ूरी देते हुए ऋणदाताओं की आपत्तियों को खारिज कर दिया और कई अहम टिप्पणियाँ कीं:

**बहुसंख्यक लेनदारों का समर्थन:** पुनर्भुगतान योजना पहले ही लेनदारों के बीच मतदान के लिए रखी जा चुकी थी, और इसे 80.81% वोटिंग हिस्सेदारी रखने वाले लेनदारों का समर्थन मिला था — जो IBC के तहत योजना की मंज़ूरी के लिए तय न्यूनतम सीमा से कहीं अधिक है।

**ट्रिब्यूनल की भूमिका सीमित:** NCLT ने स्पष्ट किया कि वह उन लेनदारों के व्यावसायिक निर्णय की जगह अपना निर्णय नहीं थोप सकता, जिन्होंने इस योजना पर मतदान किया है, और न ही वह बिना ठोस सबूत वाले आरोपों की व्यापक जाँच कर सकता है। ट्रिब्यूनल ने कहा कि उसकी भूमिका पर्यवेक्षी और सुधारात्मक है — यानी यह जाँचना कि योजना कानून के अनुरूप है या नहीं, न कि यह तय करना कि लेनदारों को "पर्याप्त अच्छा" सौदा मिला या नहीं।

**कुछ लेनदारों के वोट खारिज करने से इनकार:** आपत्ति जताने वाले पक्षों ने तर्क दिया था कि वीना इन्वेस्टमेंट्स, डायरेक्ट मीडिया डिस्ट्रीब्यूशन वेंचर्स, वर्ल्ड क्रेस्ट एडवाइजर्स, लेमनेड कैपिटल एडवाइजर्स और कॉर्पकॉल कैपिटल एडवाइजर्स जैसी संस्थाओं को IBC की धारा 79(2)(जी) के तहत चंद्रा के "सहयोगी" (एसोसिएट) माना जाना चाहिए और उनके वोट रद्द किए जाने चाहिए। ट्रिब्यूनल ने इससे असहमति जताई और कहा कि केवल इन संस्थाओं के चंद्रा के साथ पारिवारिक, व्यावसायिक या वाणिज्यिक निकटता के आरोप के आधार पर "सहयोगी" की कानूनी परिभाषा को विस्तारित नहीं किया जा सकता।

**रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल की चूक को घातक नहीं माना गया:** ट्रिब्यूनल ने पाया कि रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल की एक प्रशासनिक चूक इतनी गंभीर नहीं थी कि पूरी योजना को अमान्य ठहराया जा सके।

**योजना सभी लेनदारों पर लागू:** IBC की धारा 115 के तहत, एक बार मंज़ूरी मिलने के बाद यह पुनर्भुगतान योजना सभी लेनदारों पर बाध्यकारी होती है — चाहे उन्होंने इसके खिलाफ मतदान किया हो या मतदान से दूर रहे हों।

आगे क्या होगा

तीसरे सदस्य की राय अब बहुमत का दृष्टिकोण बन जाने के बाद, यह मामला मूल दो-सदस्यीय पीठ के पास औपचारिक आदेश जारी करने के लिए वापस भेजा जाएगा, ताकि स्वीकृत योजना को प्रभावी किया जा सके। मामले की देखरेख कर रहे रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल की अब यह ज़िम्मेदारी होगी कि वह लेनदारों की अंतिम सूची तैयार करें और दावेदारों के बीच ₹6.5 करोड़ की समझौता राशि का वितरण शुरू करें।

यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि इस समझौते के बाद ऋणदाता खाली हाथ नहीं रह जाएंगे। चूँकि यह मामला विशेष रूप से चंद्रा की व्यक्तिगत गारंटर के रूप में देनदारी से संबंधित है, इसलिए लेनदारों को यह अधिकार बना रहेगा कि वे मूल कॉर्पोरेट कर्ज़दारों, संबंधित सुरक्षा (सिक्योरिटीज़) और अन्य उपलब्ध संपत्तियों से अलग से वसूली जारी रख सकें — भले ही इस योजना के तहत चंद्रा की व्यक्तिगत गारंटर वाली देनदारी का निपटारा हो चुका हो।

व्यापक संदर्भ

इस मामले ने न केवल अपने आकार के कारण, बल्कि एस्सेल ग्रुप के प्रवर्तकों से जुड़ी अन्य नियामक कार्रवाइयों के साथ इसके मेल के कारण भी ध्यान खींचा है। अगस्त 2026 में, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने सुभाष चंद्रा और उनके बेटे पुनीत गोयनका दोनों को भूमि गिरवी (लैंड प्लेज) खुलासों से जुड़े एक अलग मामले में एक साल के लिए शेयर बाज़ार से प्रतिबंधित कर दिया। हालांकि यह दिवालियापन कार्यवाही से असंबंधित है, फिर भी इन दोनों घटनाक्रमों ने मिलकर समूह में गवर्नेंस से जुड़े मुद्दों पर ध्यान बनाए रखा है।

अधिकारियों ने यह स्पष्ट करने की भी कोशिश की है कि इस मामले को भारत में दिवालियापन वसूली का सामान्य प्रतिनिधि उदाहरण नहीं माना जाना चाहिए। सरकारी सूत्रों के हवाले से दिए गए आँकड़ों के अनुसार, मार्च 2026 तक NCLT द्वारा स्वीकृत रिज़ॉल्यूशन योजनाओं के माध्यम से लेनदारों ने लगभग ₹4.32 लाख करोड़ की वसूली की है, जिसमें औसत वसूली दर परिसमापन मूल्य (लिक्विडेशन वैल्यू) का 116.85% और उचित मूल्य (फेयर वैल्यू) का 94.56% रही है — ये आँकड़े चंद्रा के व्यक्तिगत दिवालियापन मामले के नतीजे से काफी अलग हैं, क्योंकि उनका मामला एक विशिष्ट परिस्थिति — व्यक्तिगत गारंटी — से जुड़ा था, न कि एक सामान्य कॉर्पोरेट रिज़ॉल्यूशन प्रक्रिया से।

प्रमुख तथ्य एक नज़र में

कुल स्वीकृत दावे ₹22,006.57 करोड़ के थे, जबकि स्वीकृत समझौता राशि ₹6.25 करोड़ (प्रक्रिया लागत के लिए अतिरिक्त ₹25 लाख सहित) है। इस तरह लेनदारों को प्रभावी रूप से लगभग 0.03% वसूली और करीब 99.97% का हेयरकट मिला। इस योजना को 80.81% लेनदारों का समर्थन प्राप्त था। मूल व्यक्तिगत गारंटी विवेक इन्फ्राकॉन को दिए गए ₹170 करोड़ के ऋण से जुड़ी थी। यह कार्यवाही इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस (अब सम्मान कैपिटल) द्वारा IBC की धारा 95 के तहत 2022 में शुरू की गई थी, और याचिका 2024 में स्वीकार की गई। योजना को IBC की धारा 114 के तहत मंज़ूरी दी गई, और यह निर्णय तीसरे (निर्णायक) सदस्य नीलेश शर्मा ने सुनाया।

*यह लेख अगस्त 2026 के अंत तक सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी पर आधारित है। चूँकि यह मामला औपचारिक आदेश के लिए मूल NCLT पीठ के पास वापस जा रहा है, आगे इसमें और घटनाक्रम सामने आ सकते हैं।*

Advertisement

UK Add नीति आयोग द्वारा जारी निर्यात सूचकांक 06 On 28 Aug 2026

Advertisement

MP ADD मिलिए अनुपूर्ति श्रीवास्तव से 01 ON 28 AUG 2026