केजरीवाल और मनीष सिसोदिया शराब नीति केस से बरी, कोर्ट बोला - सबूत नहीं

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केजरीवाल और मनीष सिसोदिया शराब नीति केस से बरी, कोर्ट बोला - सबूत नहीं

केजरीवाल और मनीष सिसोदिया शराब नीति केस से बरी कोर्ट बोला - सबूत नहीं

Kejriwal Sisodia acquitted liquor policy: दिल्ली की राजनीति को पिछले 3 साल से हिलाकर रखने वाला शराब नीति मामला आखिरकार एक बड़े मोड़ पर पहुंच गया। राउज एवेन्यू कोर्ट के फैसले ने उस जांच पर सवाल खड़े कर दिए, जिसे देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी CBI ने लंबे समय तक आगे बढ़ाया था। कोर्ट ने कहा कि आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त ठोस सबूत नहीं हैं और चार्जशीट में गंभीर खामियां भी है। इसी वजह से आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को भ्रष्टाचार मामले में बरी कर दिया गया।

[caption id="attachment_137412" align="alignnone" width="1325"]भावुक हो गए केजरीवाल भावुक हो गए केजरीवाल[/caption]

रो पड़े केजरीवाल

कोर्ट के बाहर केजरीवाल ने मीडिया से बात की। उन्होंने कहा -

पिछले कुछ सालों से जिस तरह से BJP शराब घोटाला, शराब घोटाला कर रही थी। हमारे ऊपर आरोप लगा रही थी। आज अदालत ने सारे आरोप खारिज कर दिए और हम सबको बरी कर दिया। हम हमेशा कहते थे कि हमें भारतीय न्याय प्रणाली पर भरोसा है। मैं जज साहब का शुक्रिया करता हूं, जिन्होंने हमारे साथ न्याय किया। सत्य की जीत हुई। मोदी जी और अमित शाह जी ने आजाद भारत का यह सबसे बड़ा राजनीतिक षड्यंत्र रचा। AAP को खत्म करने के लिए आम आदमी पार्टी के सबसे बड़े 5 नेताओं को जेल में डाल दिया। इतना कहते ही केजरीवाल रो पड़े। उन्हें बाजू में खड़े मनीष सिसोदिया ने ढांढस बंधाया। 

चार्जशीट में खामियां

अदालत ने माना कि जांच के दौरान कई अहम सवालों के संतोषजनक जवाब नहीं दिए गए। यही वजह रही कि पहले कुलदीप सिंह, फिर मनीष सिसोदिया और अंत में अरविंद केजरीवाल को आरोपमुक्त करने का आदेश दिया गया। कोर्ट की टिप्पणी से यह संकेत मिला कि मौजूदा रिकॉर्ड के आधार पर आगे की कार्रवाई टिकाऊ नहीं है।

Kejriwal Sisodia acquitted liquor policy: क्या है नई शराब नीति?

दिल्ली शराब नीति केस 2021-22 की नई आबकारी नीति से जुड़ा केस था। दिल्ली सरकार ने नवंबर 2021 में नई एक्साइज पॉलिसी लागू की थी। इसका मकसद शराब बिक्री व्यवस्था को सरकारी नियंत्रण से हटाकर निजी क्षेत्र को देना था। दिल्ली सरकार का दावा था कि इससे भ्रष्टाचार कम होगा, ग्राहकों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी और राजस्व भी बढ़ेगा। लेकिन कुछ महीनों बाद आरोप लगे कि यह नीति इस तरह बनाई गई जिससे चुनिंदा निजी कंपनियों को ही फायदा मिला। यहीं से विवाद शुरू हुआ और मामला राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से निकलकर आपराधिक जांच तक पहुंच गया।

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