अगर आप एक महिला हैं, तो कितना बार आप भी एक ही हाथ में फोन, मेट्रो कार्ड, पानी की बोतल और चाबियां लेकर घर से बाहर निकली होंगी। इस परेशानी को दूर करने के लिए या तो अलग से एक पर्स साथ लिया जाए या फिर एक हाथ में ही सभी चीजों को बैलेंस किया जाए, ताकि दूसरा हाथ फ्री रह सके। हालांकि, कपड़ों में जेब न होने की ये समस्या आज की नहीं है, बल्कि काफी पुरानी है। महिलाओं और पुरुषों के कपड़ों के डिजाइन में ये अंतर सालों पुराना है। जहां पुरुषों के कपड़ों में बड़ी और गहरी पॉकेट्स होती हैं, वहीं महिलाओं के कपड़ों में सिर्फ बनावट पर ध्यान दिया जाता है। अगर सिर्फ भारतीय महिलाओं की बात करें, तो भी उनके कपड़ों में जेब न होना कोई इत्तेफाक नहीं है, बल्कि इसके पीछे ऐतिहासिक और आर्थिक कारण छिपे हैं। आइए जानें इस बारे में।

पैसों के लिए निर्भरता
हमारा समाज ऐतिहासिक रूप से पुरुष प्रधान रहा है। पहले के दौर में व्यापार और बाहरी लेन-देन का काम आमतौर पर पुरुष ही करते थे और महिलाएं घर के अंदर के काम देखती थीं। इसलिए चाबी, पैसे और कागद आदि संभालने की जिम्मेदारी पुरुषों पर आई। इसलिए उस जमाने में महिलाओं के कपड़ों में जेब बनाने का ख्याल आया ही नहीं, क्योंकि उस समय इसकी जरूरत नहीं समझी जाती थी।
सिले नहीं जाते थे कपड़े
भारतीय महिलाएं पहले साड़ी ज्यादा पहनती थीं, जिसे लपेटकर पहना जाता था। इसमें सिलाई का कोई काम नहीं था। यहां तक कि पेटीकोट और ब्लाउज का चलन भी काफी बाद में आया। ऐसे में पॉकेट बनाने के लिए सिलाई करनी पड़ती और उस जमाने में महिलाओं के कपड़े सिले हुए नहीं हुआ करते थे। इसलिए जेब का कोई सवाल ही नहीं था।
फैशन पर ज्यादा जोर
महिलाओं के कपड़ों को बनाते समय यूटिलिटी का कम और फैशन का ज्यादा ध्यान रखा जाता था। यहीं भारतीय महिलाओं के साथ भी था। अगर उनकी सलवार-कमीज या लहंगे आदि में जेब बना दी जाती, तो कमर के पास ज्यादा उभार आ जाता। इससे कपड़े की बनावट बिगड़ती। कपड़ों का शेप न बिगड़े, इसलिए महिलाओं के कपड़ों में जेब नहीं बनाई जाती थी।
सामान रखने के दूसरे तरीके
भारतीय महिलाओं के पास जेब न होने के बावजूद सामान रखने के लिए कई अनोखे तरीके हुआ करते थे। चाबी या पैसों को साड़ी के पल्लू से बांध लिया जाता था। पैसों को रखने के लिए पेटीकोट या सलवार के नारे से पोटली बांध लिया करती थीं, ताकि पैसे सुरक्षित रहें। कमरबंद में चाबी लटकाने या ब्लाउज में पैसे रखना भी इसी जुगाड़ का हिस्सा थे।
वेस्टर्न फैशन का प्रभाव
18वीं और 19वीं सदी में जब वेस्टर्न फैशन में बदलाव आया, तो महिलाओं के कपड़ों में जेब न बनाने के पीछे हैंड बैग्स की बिक्री को बढ़ावा देना कारण था। अंग्रेजों के साथ ये फैशन भारत भी पुहंचा और यहां के कपड़ों में भी महिलाओं के लिए जेब न बनाने या बहुत छोटी जेबें बनाई जाने लगीं, ताकि वे किसी काम न आ सकें और महिलाओं को पर्स या हैंडबैग खरीदना पड़े।