उत्तर प्रदेश में भूजल पुनर्भरण परियोजना

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार द्वारा भूजल पुनर्भरण के लिए नई परियोजना

योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश में गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र में भूजल पुनर्भरण के लिए 1.65 करोड़ रुपये की MAR परियोजना शुरू की।

By : सोनिया रायकवार
उत्तर प्रदेश में योगी सरकार द्वारा भूजल पुनर्भरण के लिए नई परियोजना

उत्तर प्रदेश में भूजल संरक्षण और जल सुरक्षा को लेकर योगी सरकार ने वैज्ञानिक तरीके से काम तेज कर दिया है। गंगा-यमुना दोआब में भूजल स्तर बढ़ाने के लिए 1.65 करोड़ रुपये की ‘प्रबंधित जलभृत पुनर्भरण’ यानी MAR परियोजना शुरू की गई है। तीन साल की इस परियोजना के तहत बारिश के पानी को जमीन के अंदर मौजूद प्राकृतिक जलभंडार यानी जलभृतों तक पहुंचाकर भूजल का पुनर्भरण किया जाएगा।

इस परियोजना के दौरान कानपुर से प्रयागराज के बीच करीब 200 किलोमीटर लंबी भूमिगत प्राचीन नदी या पैलियोचैनल प्रणाली की पहचान हुई है। वैज्ञानिकों के अनुसार, जमीन के नीचे मौजूद ये पुराने नदी मार्ग आज भी भूजल के प्रवाह में भूमिका निभा सकते हैं।

200 किमी लंबी भूमिगत प्राचीन नदी का पता

भूगर्भ जल विभाग के अधिकारियों के अनुसार, सीएसआईआर-राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान (NGRI), हैदराबाद के वैज्ञानिकों ने आधुनिक तकनीक के जरिए गंगा-यमुना दोआब के नीचे मौजूद जलभृतों और प्राचीन नदी प्रणालियों का अध्ययन किया।

इस अध्ययन में हवाई भू-भौतिकीय सर्वेक्षण और बोरहोल लॉगिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया। इसी वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर कानपुर से प्रयागराज के बीच करीब 200 किलोमीटर लंबी पैलियोचैनल प्रणाली की पहचान की गई है।

आसान भाषा में समझें तो यह जमीन के नीचे मौजूद पुराने नदी मार्गों के निशान हैं, जिनका इस्तेमाल आज भी पानी के प्रवाह के लिए हो सकता है।

बारिश का पानी जमीन के अंदर पहुंचाने की तैयारी

MAR परियोजना का मुख्य उद्देश्य बारिश के पानी को बहकर बर्बाद होने से रोकना और उसे प्राकृतिक जलभृतों तक पहुंचाना है। जलभृत जमीन के नीचे पानी को जमा रखने वाली प्राकृतिक परतें होती हैं। इन्हीं से कुओं और नलकूपों के जरिए भूजल उपलब्ध होता है।

वैज्ञानिक अध्ययन के जरिए यह पता लगाया जाएगा कि बारिश का पानी जमीन के अंदर किस स्थान और किस रास्ते से तेजी से पहुंच सकता है। इसी जानकारी के आधार पर भूजल पुनर्भरण के लिए उपयुक्त स्थानों का चयन किया जाएगा।

1.65 करोड़ की परियोजना, छह जगहों पर पायलट

राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के वित्तीय सहयोग से भूगर्भ जल विभाग, उत्तर प्रदेश इस परियोजना को लागू कर रहा है। परियोजना की कुल लागत 1.65 करोड़ रुपये है और इसकी अवधि तीन वर्ष रखी गई है।

पहले चरण में छह स्थानों का चयन किया गया है। इन स्थानों पर पायलट आधार पर भूजल पुनर्भरण की संरचनाएं तैयार की जाएंगी। बारिश के पानी को इन संरचनाओं के जरिए जमीन के अंदर पहुंचाया जाएगा और इसके बाद भूजल स्तर में होने वाले बदलाव की वैज्ञानिक तरीके से निगरानी की जाएगी।

पायलट प्रोजेक्ट के बाद बढ़ेगा दायरा

छह चयनित स्थानों पर पहले यह जांचा जाएगा कि पुनर्भरण संरचनाओं का भूजल स्तर पर कितना प्रभाव पड़ता है। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि अलग-अलग स्थानों पर मौजूद जलभृत बारिश के पानी को किस तरह ग्रहण करते हैं।

पायलट परियोजना से मिलने वाले परिणामों के आधार पर भूजल पुनर्भरण की तकनीक को गंगा-यमुना दोआब के अन्य उपयुक्त क्षेत्रों तक विस्तार देने की योजना है। इससे भविष्य में बड़े क्षेत्र के लिए वैज्ञानिक आधार पर भूजल संरक्षण की योजनाएं तैयार करने में मदद मिल सकती है।

नदी, बारिश और भूजल के संबंध पर भी नजर

एनजीआरआई के अध्ययन में गंगा और यमुना नदियों तथा जमीन के नीचे मौजूद प्रमुख जलभृतों के बीच हाइड्रोजियोलॉजिकल संबंध के संकेत मिले हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार प्राचीन नदी मार्ग भी जलभृतों के भीतर भूजल के प्रवाह के संभावित रास्ते हो सकते हैं।

परियोजना के दौरान नदी, बारिश के पानी, भूजल और इन प्राचीन नदी मार्गों के बीच संबंध को समझने पर भी ध्यान दिया जाएगा। एनजीआरआई के तकनीकी सहयोग से भूजल की निगरानी, शोध और पुनर्भरण संरचनाओं के प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन किया जाएगा।

इसके साथ ही लोगों को भूजल संरक्षण के प्रति जागरूक करने के लिए सूचना, शिक्षा और संचार (IEC) गतिविधियां भी संचालित की जाएंगी। परियोजना के परिणामों के आधार पर भविष्य में उत्तर प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में भी भूजल पुनर्भरण की योजनाओं को बेहतर तरीके से तैयार करने में मदद मिल सकती है।

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