मोहाली की विशेष अदालत ने नशीले पदार्थों से जुड़े NDPS मामले में आरोपी सिंगर गुरिंदर पाल सिंह उर्फ वड्डा गरेवाल को बरी कर दिया है। अदालत ने अभियोजन पक्ष के सबूतों और गवाहों के बयानों में गंभीर कमियां पाए जाने के बाद आरोपी को संदेह का लाभ दिया। वड्डा गरेवाल संगरूर के कमोमजरा कलां का रहने वाला है। वह गायक एलि मांगट यानी हरकिरत सिंह मांगट का करीबी बताया जाता रहा है। मामले में आरोपी ने पुलिस पर रंजिश के चलते झूठी अफीम बरामदगी दिखाकर केस दर्ज करने का आरोप लगाया था।
अस्पताल में मिला था आरोपी
मामला 15 अप्रैल 2020 का है। थाना सोहाना पुलिस को श्री हरकृष्ण अस्पताल से सूचना मिली थी कि गुरिंदर पाल सिंह उर्फ वड्डा गरेवाल नशीले पदार्थ की ओवरडोज के कारण अस्पताल की चौथी मंजिल के कमरा नंबर 412 में भर्ती है। सूचना के बाद SI हरजिंदर सिंह के नेतृत्व में पुलिस टीम अस्पताल पहुंची। पुलिस के मुताबिक आरोपी उसी कमरे में बेड पर मिला और पूछताछ में उसने अपनी पहचान गुरिंदर पाल सिंह के रूप में बताई।
बैग से 30 ग्राम अफीम मिलने का दावा
पुलिस ने कमरे में रखे एक बैग पर संदेह जताया। आरोपी को NDPS एक्ट की धारा 50 के तहत उसके तलाशी संबंधी अधिकारों की जानकारी दी गई। पुलिस के अनुसार आरोपी ने जांच अधिकारी पर भरोसा जताया और इसके बाद सहमति पत्र तैयार किया गया। तलाशी के दौरान पुलिस ने बैग से पॉलीथिन में रखी 30 ग्राम अफीम बरामद होने का दावा किया। इसके बाद अफीम का वजन कर उसे सील किया गया और बैग व बरामद पदार्थ को जब्ती मेमो के जरिए कब्जे में लिया गया। इसके बाद रुक्का भेजकर थाना सोहाना में FIR नंबर 145 दर्ज की गई। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर साइट प्लान और अन्य दस्तावेज तैयार किए।
कोर्ट में कमजोर हुई पुलिस की कहानी
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की कहानी पर कई सवाल उठे। अदालत ने पाया कि पुलिस आरोपी को बैग से बरामद अफीम से सीधे तौर पर जोड़ने के लिए पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर सकी। जांच अधिकारी SI हरजिंदर सिंह ने माना कि आरोपी जिस कमरे में भर्ती था, वहां दो बेड थे। जिस बैग से अफीम मिलने का दावा किया गया, वह आरोपी के बेड के बजाय दूसरे बेड पर रखा था। पुलिस को बैग के अंदर आरोपी का कोई पहचान पत्र या निजी सामान भी नहीं मिला। जांच अधिकारी ने यह भी माना कि यह संभावना थी कि बैग किसी दूसरे व्यक्ति का हो सकता है।
अस्पताल के रिकॉर्ड की भी नहीं हुई जांच
अदालत के सामने यह बात भी आई कि पुलिस ने अस्पताल के कर्मचारियों के बयान दर्ज नहीं किए। इसके अलावा कमरे में आने-जाने वाले लोगों की जानकारी के लिए विजिटर रजिस्टर की भी जांच नहीं की गई। अदालत के मुताबिक इन पहलुओं की जांच से यह स्पष्ट हो सकता था कि आरोपी के अलावा उस कमरे में कौन-कौन लोग आते-जाते थे और बैग किसका था।
पुलिस गवाह के बयान में विरोधाभास
मामले में पुलिस गवाह SI बरमा सिंह के बयान में भी विरोधाभास सामने आया। उनके शुरुआती बयान के मुताबिक आरोपी को थाने में उनके सामने पेश किया गया था, जबकि बाद में उन्होंने कहा कि थाने में केवल केस प्रॉपर्टी लाई गई थी। इस विरोधाभास ने अभियोजन पक्ष के मामले को और कमजोर किया।
NDPS की जरूरी प्रक्रिया पर भी सवाल
अदालत ने यह भी पाया कि मामले में NDPS एक्ट की धारा 42 और धारा 57 के तहत जरूरी प्रक्रियाओं के पालन को लेकर कमियां थीं। तलाशी के दौरान अस्पताल से किसी स्वतंत्र गवाह को भी शामिल नहीं किया गया था। इसके अलावा पुलिस ने आरोपी के कथित नशीले पदार्थ के सेवन की पुष्टि के लिए उसका नमूना फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी नहीं भेजा। जिस डॉक्टर डॉ. लवली मान ने डोप टेस्ट रिपोर्ट तैयार की थी, उन्हें भी अदालत में अभियोजन पक्ष के गवाह के तौर पर पेश नहीं किया गया।
शराब के ओवरडोज की बात भी सामने आई
जांच के दौरान यह पहलू भी सामने आया कि आरोपी को शराब के अत्यधिक सेवन के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया था। ऐसे में अभियोजन पक्ष आरोपी के नशीले पदार्थ के सेवन से जुड़े आरोप को वैज्ञानिक और ठोस सबूतों से साबित नहीं कर सका।
सोशल मीडिया गतिविधियों का भी था विवाद
वड्डा गरेवाल ने अदालत में बताया कि वह गायक एलि मांगट के समर्थन में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म यूट्यूब पर कई वीडियो अपलोड करता था। पुलिस का मानना था कि इन वीडियो और एलि मांगट के समर्थन की वजह से पूरब प्रीमियम अपार्टमेंट्स के बाहर बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा हुए थे। आरोपी का आरोप था कि इसी वजह से थाना सोहाना पुलिस उससे रंजिश रखती थी और इसी रंजिश के चलते उसके खिलाफ झूठी अफीम बरामदगी दिखाई गई। हालांकि अदालत ने बरी करने का फैसला अभियोजन पक्ष के सबूतों में कमियों और आरोपी को बरामदगी से जोड़ने के पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलने के आधार पर दिया।
7 प्वाइंट में समझें क्यों बरी हुआ वड्डा गरेवाल
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अफीम वाला बैग आरोपी के बेड पर नहीं, दूसरे बेड पर मिला।
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बैग में आरोपी का कोई पहचान पत्र या निजी सामान नहीं मिला।
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जांच अधिकारी ने दूसरे व्यक्ति के बैग होने की संभावना स्वीकार की।
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अस्पताल कर्मचारियों और विजिटर रजिस्टर की जांच नहीं हुई।
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पुलिस गवाह के बयानों में विरोधाभास सामने आया।
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NDPS एक्ट की जरूरी प्रक्रियाओं के पालन पर सवाल उठे।
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डोप टेस्ट और नशीले पदार्थ के सेवन को साबित करने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक सबूत पेश नहीं किए गए।
इन कमियों के आधार पर अदालत ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।