मानसिक स्वास्थ्य कानून के तहत महिला को राहत: केरल हाईकोर्ट ने शिशु हत्या मामले म...

महिला की सजा रद्द

मानसिक स्वास्थ्य कानून के तहत महिला को राहत: केरल हाईकोर्ट ने शिशु हत्या मामले में दोषसिद्धि, उम्रकैद की सजा रद्द की

केरल हाईकोर्ट ने मानसिक तनाव के चलते एक महिला की सजा और दोषसिद्धि रद्द कर दी, जिसे पहले अपने बच्चे की हत्या का दोषी पाया गया था।

मानसिक स्वास्थ्य कानून के तहत महिला को राहत केरल हाईकोर्ट ने शिशु हत्या मामले में दोषसिद्धि उम्रकैद की सजा रद्द की

मानसिक स्वास्थ्य कानून के तहत महिला को राहत: केरल हाईकोर्ट ने शिशु हत्या मामले में दोषसिद्धि, उम्रकैद की सजा रद्द की | None

केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में अपने 15 महीने के बेटे की हत्या के आरोप में दोषी ठहराई गई महिला की सजा और दोषसिद्धि को रद्द कर दिया है। अदालत ने माना कि घटना के समय महिला गंभीर मानसिक तनाव और मनोवैज्ञानिक आघात से गुजर रही थी, इसलिए उसे मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 (Mental Healthcare Act) के तहत कानूनी संरक्षण प्राप्त है।

न्यायमूर्ति राजा विजयराघवन वी और न्यायमूर्ति के. वी. जयकुमार की खंडपीठ ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि महिला ने बच्चे की मौत से जुड़े घटनाक्रम के दौरान स्वयं भी आत्महत्या का प्रयास किया था। ऐसे में उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत दंडित नहीं किया जा सकता।

प्रतीकात्मक तस्वीर

सत्र न्यायालय ने सुनाई थी उम्रकैद

इस मामले में महिला को नवंबर 2023 में एक सत्र न्यायालय ने अपने बच्चे की हत्या का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ महिला ने केरल हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

अपील में महिला ने दावा किया कि विवाह के बाद उसे लगातार प्रताड़ना, मानसिक उत्पीड़न और भावनात्मक शोषण का सामना करना पड़ा। इसी कारण वह गंभीर मानसिक तनाव की स्थिति में पहुंच गई थी।

आत्महत्या के प्रयास से जुड़े मिले साक्ष्य

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि घटना से पहले महिला ने बड़ी मात्रा में पैरासिटामोल की गोलियां खाई थीं, अपने हाथों की नसों को किसी धारदार वस्तु से घायल किया था और एक सुसाइड नोट भी लिखा था। अदालत ने माना कि ये सभी परिस्थितियां इस बात की ओर संकेत करती हैं कि वह अत्यधिक मानसिक दबाव में थी।

अदालत ने यह भी कहा कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2018 में लागू हुआ था और 2021 में शुरू हुए मुकदमे के दौरान यह कानून प्रभावी था। इसलिए निचली अदालत को इसके प्रावधानों पर विचार करना चाहिए था।

अभियोजन पक्ष की दलील खारिज

अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया था कि महिला को मानसिक स्वास्थ्य कानून की धारा 115 का लाभ नहीं मिल सकता, क्योंकि उसे आत्महत्या के प्रयास से संबंधित धारा 309 के मामले में बरी कर दिया गया था।

हालांकि हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष ने इस आरोप को गंभीरता से आगे नहीं बढ़ाया था। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 309 से बरी होने का अर्थ यह नहीं है कि आत्महत्या का प्रयास हुआ ही नहीं था।

पति और ससुराल वालों पर उत्पीड़न के आरोप

महिला ने अपनी दलील में आरोप लगाया था कि विवाह के बाद पति और ससुराल पक्ष की ओर से उसे लगातार प्रताड़ित किया गया। उस पर अवैध संबंध रखने के आरोप लगाए गए और बच्चे की पितृत्व को लेकर भी सवाल उठाए गए। इसके अलावा अतिरिक्त दहेज की मांग किए जाने का भी आरोप लगाया गया।

प्रतीकात्मक तस्वीर

महिला का कहना था कि इन घटनाओं के कारण वह गंभीर मानसिक अवसाद में चली गई थी। अदालत ने सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करते हुए उसकी अपील स्वीकार कर ली तथा दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को निरस्त करते हुए उसकी तत्काल रिहाई के आदेश दिए।

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