फिर नहीं हिले GST के ‘अंगद’, एक कमरे से दूसरे कमरे तक ही सिमटी वाणिज्यिक कर विभाग की ट्रांसफर पॉलिसी

भोपाल में GST विभाग का विवाद

फिर नहीं हिले GST के ‘अंगद’, एक कमरे से दूसरे कमरे तक ही सिमटी वाणिज्यिक कर विभाग की ट्रांसफर पॉलिसी

भोपाल के GST विभाग में ट्रांसफर नीति के तहत कई अधिकारी वर्षों से एक ही स्थान पर जमे हुए हैं, जबकि कुछ की शिकायतें लंबित हैं।

फिर नहीं हिले gst के ‘अंगद’ एक कमरे से दूसरे कमरे तक ही सिमटी वाणिज्यिक कर विभाग की ट्रांसफर पॉलिसी

भोपाल। वाणिज्यिक कर विभाग (GST) में तबादला नीति को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े होने लगे हैं। विभाग में लंबे समय से जमे अधिकारियों के स्थानांतरण की उम्मीद लगाए बैठे कर्मचारियों को इस बार भी निराशा हाथ लगी है। आरोप है कि ट्रांसफर नीति का असर केवल सीमित स्तर पर दिखाई दिया और कई अधिकारी वर्षों से एक ही स्थान पर जमे रहने के बावजूद अपनी कुर्सी बचाने में सफल रहे।

भोलाराम बामने जैसे नाम शामिल बताए जा रहे

सूत्रों के अनुसार विभाग में ऐसे सैकड़ों अधिकारी हैं जो 10 वर्ष या उससे अधिक समय से राजधानी भोपाल समेत एक ही स्थान पर पदस्थ हैं। इनमें सिम्मी जैन, सुनील बांगड़, सीमांत सक्सेना, आकांक्षा सिंह, पल्लवी मालपानी, अनिल समेले, बलिराम ठकुरिया, रवि तोमर, सपना पगारे, करुणा सिंघाड़े, सोनिया जैन, नेहा बहोरे, रंजना जैन, माया वानखेड़े, मोनिका अलावा, रूपेश जैन, अतुल भदौरिया, संदीप श्रीवास्तव, जितेंद्र चौहान, केशव मार्सकोले, डी.डी. धाकड़, राजाराम अहीरवार, रितु रावत, सुनंदा दुबे, सीमा मिश्रा, प्रियंका पटेल, अभिलाषा काले और भोलाराम बामने जैसे नाम शामिल बताए जा रहे हैं।

इसके बावजूद इनके तबादले नहीं किए गए

जानकारी के मुताबिक इनमें से कुछ अधिकारियों के खिलाफ शिकायतें भी लंबित हैं। सूत्रों का दावा है कि प्रियंका पटेल, नेहा बहोरे, रितु रावत, संदीप श्रीवास्तव और रूपेश जैन से संबंधित शिकायतें विभिन्न स्तरों पर विचाराधीन हैं। कुछ मामलों की जांच लोकायुक्त में चल रही है, जबकि कुछ शिकायतें विभागीय मुख्यालय और सीएम हेल्पलाइन में लंबित बताई जा रही हैं। इसके बावजूद इनके तबादले नहीं किए गए।

विभाग के भीतर ट्रांसफर प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठने लगे

वहीं दूसरी ओर ऐसे अधिकारी, जिन्होंने पारिवारिक और व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए स्थानांतरण के लिए आवेदन किया था, उन्हें राहत नहीं मिल सकी। बताया जा रहा है कि विभागीय आयुक्त ने तीन वर्ष से अधिक समय से एक ही स्थान पर पदस्थ अधिकारियों को आवेदन करने के निर्देश दिए थे, लेकिन कई आवेदनों पर कोई सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया। इससे विभाग के भीतर ट्रांसफर प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

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