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padma shri 2026: इन चार शख्सियतों ने अपने काम से बढ़ाया मध्यप्रदेश का मान

By : Narendra Singh
padma shri 2026: इन चार शख्सियतों ने अपने काम से बढ़ाया मध्यप्रदेश का मान
padma shri 2026: साल 2026 के पद्मश्री पुरस्कारों की घोषणा के साथ ही मध्यप्रदेश के लिए यह खबर खास बन गई है. इस बार प्रदेश की चार ऐसी हस्तियों को देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा जा रहा है, जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में चुपचाप, लेकिन गहराई से समाज को बदला. इन नामों में भोपाल के वरिष्ठ लेखक कैलाश चंद्र पंत, सागर के मार्शल आर्ट साधक भगवानदास रैकवार, मप्र जन अभियान परिषद के उपाध्यक्ष मोहन नागर और उज्जैन के पुरातत्वविद् डॉ. नारायण व्यास शामिल हैं। 

padma shri 2026: कैलाश चंद्र पंत

भोपाल के प्रख्यात साहित्यकार और पत्रकार कैलाश चंद्र पंत उन लोगों में हैं, जिन्होंने हमेशा सुर्खियों से दूरी बनाए रखी। साहित्यिक पत्रिका ‘अक्षरा’ उनके लिए केवल पत्रिका नहीं, बल्कि एक जीवित मंच रही, जहां समाज और समय से संवाद होता रहा.भोपाल में हिन्दी भवन न्यास और किसान कैलाश चंद्र पंत भवन के विकास में उनकी भूमिका ने यह साफ किया कि उनका काम केवल लेखन तक सीमित नहीं रहा.पद्मश्री की घोषणा पर उनका कहना था,यह सम्मान मेरा नहीं, हिन्दी की कृपा है. Also Read-मुरैना में कुत्ते का डर दिखाकर 5 साल की मासूम से दरिंदगी, पिता ने भेजा था गुटखा लाने

padma shri 2026: मोहन नागर

प्रदेश के कई गांवों में मोहन नागर का नाम किसी औपचारिक पद से ज़्यादा, काम से पहचाना जाता है। साधारण परिवार में जन्मे मोहन नागर ने बचपन से ही देखा कि शिक्षा, पानी और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं गांवों से कितनी दूर हैं. उन्होंने शिक्षा को बदलाव की सबसे बड़ी ताकत माना. भारत भारती आवासीय विद्यालय के माध्यम से बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ सामाजिक चेतना जगाने का काम किया. आज वे मप्र जन अभियान परिषद के उपाध्यक्ष हैं।

भगवानदास रैकवार

सागर जिले के एक छोटे से गांव में जन्मे भगवानदास रैकवार की पहचान आज बुंदेलखंड की पारंपरिक मार्शल आर्ट से जुड़ी हुई है। बचपन से ही उन्हें अखाड़ा, लाठी-भाला और तलवारबाजी में गहरी रुचि थी. समय के साथ उन्होंने महसूस किया कि ये लोककलाएं धीरे-धीरे समाज से गायब होती जा रही हैं। यह उनके लिए केवल खेल नहीं था, बल्कि बुंदेली संस्कृति की आत्मा थी। 1982 में उन्होंने एक बड़ा और कठिन फैसला लिया, सरकारी नौकरी छोड़ दी, ताकि पूरी तरह इस विरासत को बचाने में जुट सकें. रैकवार दाऊ की साधना और धैर्य ने बुंदेली मार्शल आर्ट को नई पहचान दी. पद्मश्री सम्मान उनके कौशल के साथ-साथ उस निस्वार्थ समर्पण का भी सम्मान है, जिसने एक परंपरा को मिटने से बचा लिया.

डॉ. नारायण व्यास

उज्जैन में 5 जनवरी 1949 को जन्मे डॉ. नारायण व्यास का जीवन भारतीय पुरातत्व को समझने और सहेजने में बीता। इतिहास और मानव सभ्यता में उनकी रुचि इतनी गहरी रही कि उन्होंने भू-कला और शैलचित्रों पर डी.लिट की उपाधि प्राप्त की. भोपाल, रायसेन और भीमबेटका क्षेत्र के प्रागैतिहासिक शैलचित्रों पर उनका काम देशभर में सराहा गया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में करीब चार दशक की सेवा के बाद वे सुपरिंटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट के पद से सेवानिवृत्त हुए. डॉ. व्यास के प्रयासों से 2000 से अधिक प्राचीन अवशेष और फॉसिल संरक्षित किए गए, जिन्हें उन्होंने एक ‘मिनी म्यूजियम’ के रूप में संजोया. 
सम्मान ने साबित कर दिया…
इन चारों हस्तियों की कहानियां अलग-अलग हैं, लेकिन सूत्र एक ही है, निरंतर काम, बिना शोर के। पद्मश्री 2026 ने एक बार फिर साबित किया है कि मध्यप्रदेश की असली पहचान उसके ऐसे कर्मयोगियों से बनती है, जो जमीन से जुड़े रहकर देश को दिशा देते हैं।  

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