महिलाओं की सुरक्षा पर बड़ा खुलासा: मुंबई सबसे सेफ, दिल्ली-पटना में डर का साया

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महिलाओं की सुरक्षा पर बड़ा खुलासा: मुंबई सबसे सेफ, दिल्ली-पटना में डर का साया

महिलाओं की सुरक्षा पर बड़ा खुलासा मुंबई सबसे सेफ दिल्ली-पटना में डर का साया

 एक साधारण सवाल क्या महिलाएं वाकई सुरक्षित हैं?

आपकी बहन रात को ऑफिस से लौट रही है, या बेटी ट्यूशन से। आपके मन में क्या पहला ख्याल आता है? शायद यही “वो सुरक्षित है या नहीं?” NARI रिपोर्ट 2025 ने इस चिंता को आंकड़ों के जरिए सामने रखा है। और जो सच सामने आया है, वो आंखें खोल देने वाला है। [caption id="attachment_101681" align="alignnone" width="640"]Tips to Persuade an Angry Girlfriend0 Tips to Persuade an Angry Girlfriend0[/caption] देश के 31 शहरों में 12,770 महिलाओं से बात कर यह रिपोर्ट तैयार की गई है। इसमें साफ कहा गया है कि मुंबई और कोहिमा जैसे शहर महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित हैं, जबकि पटना और दिल्ली सबसे कम सुरक्षित। लेकिन सवाल सिर्फ शहर का नाम जानने का नहीं है बल्कि यह समझने का है कि महिलाएं असुरक्षित क्यों महसूस करती हैं, और हम इससे क्या सीख सकते हैं।

बॉडी: सुरक्षा का एहसास और खामोश डर

 मुंबई और कोहिमा: क्यों हैं सबसे सुरक्षित?

मुंबई को लेकर महिलाओं ने कहा कि वहां की पुलिस चौकस है, ट्रांसपोर्ट व्यवस्था नियमित है, और सबसे जरूरी बात रात में भी सड़कें महिलाओं के लिए “जगह” देती हैं। कोहिमा जैसे छोटे लेकिन सामाजिक रूप से सजग शहर में महिलाओं की भागीदारी, समानता और सम्मान की भावना बहुत मजबूत है। यह चीज़ें कानून से ज़्यादा, परवरिश और समाज के व्यवहार से आती हैं।

 पटना और दिल्ली: असुरक्षा की परछाईं

वहीं दूसरी ओर दिल्ली और पटना जहाँ महिलाओं ने अक्सर पब्लिक ट्रांसपोर्ट, बस स्टॉप और सुनसान इलाकों को ‘खतरनाक’ बताया। सिर्फ 25% महिलाओं को लगता है कि अगर वे शिकायत करें तो उस पर कार्रवाई होगी। ये न्याय व्यवस्था में भरोसे की कमी को दर्शाता है, जो अपने आप में डर से भी बड़ी समस्या है।

कुछ आशाओं की किरणें भी हैं

91% महिलाएं अपने कार्यस्थल को सुरक्षित मानती हैं।   एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स में भी दिन के समय सुरक्षा का अनुभव अच्छा रहा है। महिलाओं में सुरक्षा को लेकर संवेदनशीलता और आत्म-जागरूकता बढ़ी है। पर रात होते ही, वही महिलाएं असुरक्षित महसूस करती हैं। क्या सुरक्षा सिर्फ दिन की चीज़ है?

भरोसे की दीवार कब खड़ी होगी?

सिर्फ 1 में से 3 महिलाएं ही उत्पीड़न की शिकायत करती हैं। बाकी दो चुप रहती हैं डर, शर्म, और ‘कोई सुनेगा भी क्या?’ जैसी सोच के कारण।4 साल से कम उम्र की लड़कियों में पब्लिक प्लेसेज़ में उत्पीड़न का अनुभव दोगुना है। सोचिए, ये वही उम्र होती है जब लड़कियां पहली बार अपने सपनों को जीने निकलती हैं और उसी उम्र में वे डर सीख रही हैं। NARI रिपोर्ट ने ये भी कहा कि NCRB के आंकड़े अधूरे हैं, क्योंकि ज्यादातर घटनाएं रिपोर्ट ही नहीं होतीं। Watch Now :- भोपाल में 92 करोड़ का ड्रग्स जब्त - क्या जिम्मेदार वही ! Read More:- महिलाओं की सुरक्षा पर बड़ा खुलासा: मुंबई सबसे सेफ, दिल्ली-पटना में डर का साया

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