मोबाइल गेम्स या टूटता संवाद? बच्चों की आत्महत्याओं के पीछे छिपा बड़ा सच

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मोबाइल गेम्स या टूटता संवाद? बच्चों की आत्महत्याओं के पीछे छिपा बड़ा सच

मोबाइल गेम्स या टूटता संवाद बच्चों की आत्महत्याओं के पीछे छिपा बड़ा सच

Mobile Games Impact on Children: एक खबर, जिसने झकझोर दिया

Mobile Games Impact on Children: उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से आई खबर ने आज हर संवेदनशील इंसान को भीतर तक हिला दिया है. तीन नाबालिग लड़कियों की मौत, वो भी एक साथ, और वजह के तौर पर सामने आ रही बातें और भी डराने वाली हैं. शुरुआती जानकारी में कहा गया कि मोबाइल गेम के कारण तीनों ने नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली, बाद में पुलिस ने स्पष्ट किया कि मामला थोड़ा अलग है. अब जो तथ्य सामने आए हैं, उनके मुताबिक एक लड़की आत्महत्या कर रही थी और बाकी दो उसे रोकने की कोशिश में नीचे गिर गईं. कमरे से मिला सुसाइड नोट पूरी कहानी बयान करता है. बताया जा रहा है कि तीनों लड़कियों को कोरियाई कल्चर से खास लगाव था और जब माता-पिता ने मोबाइल लेने की बात कही तो वे मानसिक रूप से टूट गईं,

Mobile Games Impact on Children: सवाल गेम का नहीं, उस खालीपन का है

यहां सवाल सिर्फ मोबाइल गेम या किसी विदेशी संस्कृति का नहीं है. असली सवाल यह है कि आखिर बच्चे इतनी गहराई से किसी आभासी दुनिया में क्यों चले जाते हैं कि असली दुनिया उन्हें बोझ लगने लगती है.

स्कूल से दूरी, समाज से कटाव

बताया जा रहा है कि तीनों लड़कियां कोरोना के बाद से स्कूल भी नहीं जा रही थीं. लॉकडाउन खत्म हुए काफी समय हो चुका है, इसके बावजूद यह लापरवाही क्यों हुई? क्या परिवार ने यह नहीं देखा कि बच्चे धीरे-धीरे समाज से कटते जा रहे हैं? यहीं से वह खालीपन शुरू होता है, जिसे मोबाइल, गेम और ऑनलाइन कंटेंट भरने लगता है. और जब वही चीज उनसे छीनी जाती है, तो उनके पास संभलने का कोई जरिया नहीं बचता,

भोपाल की घटना, वही कहानी दोहराई गई

गाजियाबाद की घटना कोई इकलौती नहीं है. मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में भी हाल ही में एक 14 वर्षीय बच्चे ने आत्महत्या कर ली. वजह, मोबाइल गेम की लत और मां की डांट. यह सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि एक दिन में ऑनलाइन गेम्स से जुड़े मामलों में चार मासूम जिंदगियां खत्म हो गईं. वे बच्चे जिनके सपने अभी आकार ले ही रहे थे, जिनका भविष्य देश और समाज के लिए कुछ कर सकता था, असमय चले गए,

दोषी कौन, तकनीक या हम?

हर बार आसान रास्ता यही होता है कि दोष तकनीक पर डाल दिया जाए. कहा जाए कि मोबाइल खराब है, गेम जानलेवा हैं, पश्चिमीकरण बच्चों को बिगाड़ रहा है. लेकिन क्या यह पूरी सच्चाई है? Also Read-Navgrah Temple Dabra: इस शहर में बना विश्व का पहला नवग्रह शक्तिपीठ, जानिए कब है प्राण प्रतिष्ठा!

संवाद की कमी, सबसे बड़ी चूक

हकीकत यह भी है कि अगर माता-पिता बच्चों से संवाद बनाए रखें, उनके मन को समझें, उनके अकेलेपन को समय रहते पहचान लें, तो शायद कोई बच्चा इतनी दूर न जाए. मोबाइल सिर्फ एक माध्यम है, असली वजह वह दूरी है जो धीरे-धीरे घरों में बढ़ती जा रही है, आज कई घरों में महंगा मोबाइल, बड़ा टीवी और तेज इंटरनेट को ही प्रगति का पैमाना मान लिया गया है. बच्चे उसी दुनिया में उलझते चले जाते हैं और माता-पिता यह मान लेते हैं कि बच्चा घर में सुरक्षित है, जबकि वह मानसिक रूप से कहीं और भटक रहा होता है Also Read-सॉरी मम्मी-पापा, गेम नहीं छोड़ पाएंगे: तीन बहनों ने छत से कूदकर दी जान, मोबाइल में कैद आखिरी टास्क

समाज के लिए चेतावनी हैं ये घटनाएं

गाजियाबाद और भोपाल की ये घटनाएं सिर्फ दो शहरों की खबर नहीं हैं. ये पूरे समाज के लिए चेतावनी हैं. अगर अब भी नहीं संभले, अगर बच्चों को समय, संवाद और दिशा नहीं दी, तो ऐसी खबरें और आएंगी. कई घरों में अब शायद लंबे समय तक दीपक नहीं जलेगा. सवाल यही है, क्या हम अगली खबर का इंतजार करेंगे या आज ही रुककर अपने बच्चों की दुनिया को समझने की कोशिश करेंगे.

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