रिटायर्ड जज बी. सुदर्शन रेड्डी बने विपक्ष के उपराष्ट्रपति उम्मीदवार

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रिटायर्ड जज बी. सुदर्शन रेड्डी बने विपक्ष के उपराष्ट्रपति उम्मीदवार

रिटायर्ड जज बी सुदर्शन रेड्डी बने विपक्ष के उपराष्ट्रपति उम्मीदवार 

जानिए वो कहानी जो टीवी पर नहीं दिखाई जाएगी!

जब एक व्यक्ति अदालत की ऊँची कुर्सी से उठकर राजनीति की गर्म धरातल पर कदम रखता है, तो ज़रूर कोई बड़ी वजह होती है। यह सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियाद को बचाने की जद्दोजहद बन जाता है। retired judge sudarsan reddy vice president election india vs nda 79 साल के बी. सुदर्शन रेड्डी, जो कभी सुप्रीम कोर्ट के जज थे, अब I.N.D.I.A गठबंधन की ओर से उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनाए गए हैं। यह नाम चौंकाने वाला नहीं, लेकिन सोचने पर मजबूर करने वाला है। आखिर एक रिटायर्ड जज क्यों? क्यों अब? और क्यों वो?

 बी. सुदर्शन रेड्डी सिर्फ नाम नहीं, एक संघर्ष की मिसाल

आंध्र प्रदेश के एक छोटे से कस्बे में जन्मे रेड्डी का सफर आसान नहीं रहा। जब उनके साथी कॉलेज के बाद विदेश की नौकरियों के सपने देख रहे थे, तब उन्होंने वकालत की दुनिया में कदम रखा नफे नुकसान की नहीं, न्याय की भाषा में सोचने के लिए। 2007 में सुप्रीम कोर्ट में जज बने, गुवाहाटी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रहे और गोवा के पहले लोकायुक्त बने। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में उन्होंने कई बार सत्ता की आँखों में आँखें डालकर फैसले सुनाए। आज जब वो राजनीति में कदम रख रहे हैं, तो यह सिर्फ एक चुनाव लड़ने का निर्णय नहीं, बल्कि एक जज का जनता के पक्ष में फिर से खड़ा होना है।

एक संविधान प्रेमी बनाम सत्ता का दावेदार

रेड्डी का मुकाबला NDA के सीपी राधाकृष्णन से है। दोनों दक्षिण भारत से आते हैं, लेकिन सोच और अनुभव में एक गहरी खाई है। जहां रेड्डी न्यायपालिका की निष्पक्षता लेकर आ रहे हैं, वहीं राधाकृष्णन का करियर बीजेपी और संघ की विचारधारा से जुड़ा रहा है। यह लड़ाई सिर्फ दो लोगों की नहीं, बल्कि दो सोचों की है। एक ओर संविधान को अक्षुण्ण रखने की लड़ाई है, दूसरी ओर सत्ता को बनाए रखने की कवायद। retired judge sudarsan reddy vice president election india vs nda

क्या यह सच में संविधान की आखिरी लड़ाई है?

मल्लिकार्जुन खड़गे की प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक भावुक पल था जब उन्होंने कहा,
"जब भी लोकतंत्र खतरे में होता है, हम सब एकजुट हो जाते हैं।"
यह सिर्फ एक राजनैतिक बयान नहीं था यह एक चेतावनी भी थी। पिछले कुछ सालों में जिस तरह से लोकतंत्र के स्तंभों पर दबाव बढ़ा है, यह चुनाव उसी के खिलाफ एक आवाज़ है। TMC, AAP, कांग्रेस, DMK सभी विपक्षी पार्टियों का समर्थन रेड्डी के पीछे खड़ा होना यह बताता है कि यह चुनाव सिर्फ ‘पोस्ट’ के लिए नहीं है। यह चुनाव है उस सोच के लिए जो कहती है संविधान से बड़ा कोई नहीं।

उपराष्ट्रपति चुनाव प्रक्रिया

9 सितंबर को 782 सांसदों के वोट से तय होगा कि देश का अगला उपराष्ट्रपति कौन होगा। लेकिन वोट से कहीं ज़्यादा मायने रखता है वो संदेश, जो यह चुनाव देश को देगा। एक रिटायर्ड जज, जिसने कभी सत्ता की सीमा को कानून से बाँधकर रखा, अब खुद जनता की अदालत में उतर आया है। क्या संसद उसकी फिर से जीत सुनिश्चित करेगी?

यह चुनाव है या एक नैतिक युद्ध?

राजनीति अक्सर संख्या के खेल में उलझ जाती है, लेकिन कुछ चुनाव इतिहास में दर्ज हो जाते हैं अपने मकसद के लिए, अपने सवालों के लिए। बी. सुदर्शन रेड्डी की उम्मीदवारी वैसी ही एक कहानी है। यह सिर्फ "कौन जीतेगा?" का सवाल नहीं है। यह पूछ रहा है हम संविधान को किसके हाथों में सौंप रहे हैं? Read More :- राहुल गांधी की वोट अधिकार यात्रा: गयाजी में पेड़ और बसों पर चढ़े लोग Watch Now :- #bhopalnews:भोपाल में 92 करोड़ का ड्रग्स जब्त - क्या जिम्मेदार वही !

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