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कर्नाटक उच्च न्यायालय ने पूर्व मुख्यमंत्री B.S. येदियुरप्पा के खिलाफ पॉक्सो मामले में संज्ञान आदेश बरकरार रखा

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने पूर्व मुख्यमंत्री bs येदियुरप्पा के खिलाफ पॉक्सो मामले में संज्ञान आदेश बरकरार रखा

कर्नाटक पूर्व मुख्यमंत्री B. S. येदियुरप्पा पॉक्सो act : बेंगलुरु: कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री B. S. येदियुरप्पा को बड़ी चुनौति का सामना करना पड़ रहा है। कर्नाटक उच्च न्यायालय (High Court of Karnataka) ने उनके खिलाफ दर्ज Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012 (POCSO) अधिनियम के मामले में निचली अदालत द्वारा संज्ञान लेने के आदेश को बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति एम. आई. अरुण की फांट ने स्पष्ट किया कि निचली अदालत द्वारा दिशा-निर्देश दिए जा सकते हैं और कार्यवाही जारी हो सकती है, बशर्ते कि अभियुक्तों की उपस्थिति तथा व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट के आवेदन को विधिपूर्वक देखा जाए।

आखिर मामला क्या है

India Today की रिपोर्ट के अनुसार मामला उस शिकायत से शुरू हुआ, जिसमें कहा गया था कि येदियुरप्पा ने एक नाबालिग लड़की के यौन उत्पीड़न का प्रयास किया जब उसकी मां उनसे सहायता मांगने उनके निवास पर गई थी।  शिकायत 14 मार्च 2024 को बेंगलुरु के सदाशिवनगर पुलिस स्टेशन में दर्ज हुई थी। बाद में यह मुद्रित जांच के लिए राज्य की CID शाखा को सौंपा गया। अभियोजन ने फोरेंसिक लैबों के माध्यम से यह बताया कि आरोपित की आवाज रिकॉर्डिंग में मौजूद पाई गई।

न्यायालय ने क्या कहा

Live Law की रिपोर्ट में बताया गया कि हाई कोर्ट ने पहले 7 फरवरी 2025 को निचली अदालत के संज्ञान निर्देश को “बिना योग्य कारण” और “यथोचित न्याय विचार के अभाव” में अमान्य घोषित किया था और मामला पुनर्विचार हेतु निचली अदालत को वापस भेजा था। इसके बाद 28 फरवरी 2025 को विशेष न्यायालय ने पुन: संज्ञान लिया और समन जारी किया, जिसे हाई कोर्ट ने 14 मार्च 2025 को आंशिक रूप से स्थगित किया। 13 नवंबर 2025 के ताज़ा आदेश में हाई कोर्ट ने येदियुरप्पा का मामला रद्द नहीं किया, बल्कि यह कहा है कि मामला आगे बढ़ सकता है तथा निचली अदालत को अभियुक्त की व्यक्तिगत उपस्थिति को तब तक नहीं अनिवार्य करना चाहिए जब तक कि कार्यवाही के लिए आवश्यक न हो।

आगे की क्या कार्रवाई हो सकती है

अभियुक्त पक्ष के पास निचली अदालत में दोषमुक्ति (discharge/application for quashing) का विकल्प खुला है। निचली अदालत को यह देखना है कि उपलब्ध साक्ष्य, अभियोजन द्वारा प्रस्तुत रिकॉर्डिंग और प्रमाणों को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त आदेश जारी हो। अभियोजन पक्ष ने कहा है कि रिकॉर्डिंग और अन्य फोरेंसिक रिपोर्ट्स संज्ञान लेने के लिए पर्याप्त हैं। Read More:-  सरकारी बैंकों के विलय की संभावना

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