गोरखपुर में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भारतीय ज्ञान परंपरा को देश की पहचान बताते हुए कहा कि भारत ने सदियों से ज्ञान और चिंतन की परंपरा को आगे बढ़ाया है। उन्होंने कहा कि भारत के पास तक्षशिला और नालंदा जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों की विरासत रही है, जबकि आज के कई विकसित देशों का इतिहास अपेक्षाकृत नया है।
मुख्यमंत्री ने यह बातें गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मंदिर में ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 57वीं और ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ की 12वीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित सात दिवसीय श्रद्धांजलि समारोह के दौरान कहीं। समारोह 24 से 30 सितंबर तक आयोजित किया जा रहा है।
ज्ञान की धरोहर को संरक्षित करने पर जोर
मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा पांडुलिपियों, ताम्रपत्रों और शिलालेखों में सुरक्षित रही है। इन धरोहरों को संरक्षित करने से तत्कालीन समाज, संस्कृति और ज्ञान के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिल रही है। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज ने ज्ञान को केवल अक्षरों की जानकारी तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे जीवन और समाज से जोड़ा। योग, आयुर्वेद और भारतीय चिकित्सा परंपराओं को भी इसी ज्ञान परंपरा का हिस्सा बताते हुए उन्होंने कहा कि आज इन परंपराओं को वैश्विक स्तर पर पहचान मिल रही है।
योग को दुनिया में मिली पहचान
सीएम योगी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा की वैश्विक स्वीकार्यता का एक उदाहरण योग है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस अब 190 से अधिक देशों में मनाया जाता है। PIB के अनुसार, 2014 में संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया था और पहला आयोजन 2015 में हुआ था। मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को भी आगे बढ़ाया जा रहा है। उन्होंने आयुर्वेद और अन्य भारतीय चिकित्सा परंपराओं को अपनी जड़ों से जोड़ने की जरूरत बताई।
तक्षशिला-नालंदा का दिया उदाहरण
योगी आदित्यनाथ ने कहा कि भारत के पास हजारों वर्ष पुरानी ज्ञान परंपरा है। उन्होंने तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालय का उदाहरण देते हुए कहा कि प्राचीन भारत में शिक्षा और ज्ञान के बड़े केंद्र मौजूद थे। उन्होंने कुंभ की परंपरा का भी उल्लेख किया और कहा कि प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक जैसे केंद्रों पर विद्वानों के बीच विचारों और नवाचारों को लेकर चर्चा-परिचर्चा की परंपरा रही है।
अपनी जड़ों से जुड़ने की जरूरत
मुख्यमंत्री ने कहा कि विदेशी आक्रमणों और ब्रिटिश शासन के दौरान भारत की परंपराओं और ज्ञान व्यवस्था को नुकसान पहुंचा। उन्होंने कहा कि समय के साथ भारतीय समाज अपनी कई परंपराओं से दूर होता गया। उन्होंने काशी में उत्तरवाहिनी गंगा का उदाहरण देते हुए कहा कि समाज को भी अपनी जड़ों की ओर लौटने और अपनी परंपराओं से जुड़ने की जरूरत है।
सत्य, प्रमाण और दुष्प्रचार पर बोले योगी
मुख्यमंत्री ने भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए तीन महत्वपूर्ण बिंदु बताए। उन्होंने कहा कि पहला पक्ष सत्य का होना चाहिए और जो भी बात कही जाए, उसे प्रमाण के साथ रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि दूसरा पक्ष उन लोगों का होगा जो किसी तथ्य को गलत साबित करने का प्रयास कर सकते हैं। ऐसे में प्रमाण महत्वपूर्ण होंगे। तीसरा पक्ष दुष्प्रचार या संशय पैदा करने वालों का हो सकता है। इसलिए प्रमाणों के जरिए संशय को दूर करना जरूरी है।
30 सितंबर तक होंगे कई कार्यक्रम
श्रद्धांजलि समारोह के तहत 25 सितंबर को ‘नशा नाश का कारण है’, 26 सितंबर को ‘लोकतंत्र की जननी है भारत’, 27 सितंबर को ‘संस्कृत एवं भारतीय संस्कृति’ और 28 सितंबर को ‘भारतीय संस्कृति एवं गो-सेवा’ विषय पर सम्मेलन आयोजित होंगे। 29 सितंबर को ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ और 30 सितंबर को ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ की श्रद्धांजलि सभा होगी। 29 और 30 सितंबर को अखंड मानस पाठ और भंडारे का भी आयोजन किया जाएगा।
समारोह में देशभर से धर्माचार्य, साधु-संत और शिक्षाविद शामिल होंगे। विभिन्न सम्मेलनों में आईआईटी बीएचयू, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय मोतिहारी, गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान प्रयागराज समेत कई संस्थानों से जुड़े विशेषज्ञ भी अपने विचार रखेंगे।