Broom Making: देश के कोने-कोने में पहुंचती है देपालपुर की झाड़ू, धनतेरस पर होती है विशेष पूजा

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Broom Making: देश के कोने-कोने में पहुंचती है देपालपुर की झाड़ू, धनतेरस पर होती है विशेष पूजा

broom making देश के कोने-कोने में पहुंचती है देपालपुर की झाड़ू धनतेरस पर होती है विशेष पूजा

Broom Making: मध्यप्रदेश के इंदौर जिले के देपालपुर कस्बे का एक खास इलाका पूरे देश में अपनी अनोखी पहचान बनाए हुए है, जिसे लोग "झाड़ू वाली गली" के नाम से जानते हैं। इस गली में करीब 50 परिवार पीढ़ियों से झाड़ू बनाने का पारंपरिक कार्य करते आ रहे हैं। यहां महिलाएं, पुरुष और बच्चे सभी इस हुनर में निपुण हैं और पूरे साल केवल झाड़ू बनाने का ही काम करते हैं। [caption id="attachment_111653" align="alignnone" width="290"]Broom Making Broom Making[/caption]

Broom Making: अलग-अलग प्रकार की झाड़ू बनाई जाती

झाड़ू बनाने की यह परंपरा कई वर्षों से चली आ रही है और आज भी हाथों से ही झाड़ू तैयार की जाती है, भले ही समय के साथ मशीनों और तकनीकी बदलावों ने दस्तक दी हो। देपालपुर की झाड़ू खासतौर पर खजूर के पेड़ों की डालियों से बनाई जाती है। इन डालियों को छांटकर, सुखाकर और सजाकर अलग-अलग प्रकार की झाड़ू बनाई जाती हैं, जिन्हें पूरे देश में भेजा जाता है।

सांस्कृतिक आस्था का भी प्रतीक बन चुका

धनतेरस और दीपावली जैसे त्योहारों पर इन झाड़ुओं की मांग कई गुना बढ़ जाती है। सनातन परंपरा में झाड़ू को मां लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है और यही कारण है कि धनतेरस के दिन झाड़ू की विशेष पूजा की जाती है। यह केवल सफाई का साधन नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था का भी प्रतीक बन चुका है।

हुनर से बनी झाड़ू आज पूरे देश में प्रसिद्ध

देपालपुर के झाड़ू निर्माता न केवल थोक में माल सप्लाई करते हैं, बल्कि स्थानीय बाजारों, ठेलों और काउंटरों के माध्यम से भी इन झाड़ुओं की बिक्री करते हैं। इनकी मेहनत और हुनर से बनी झाड़ू आज पूरे देश में प्रसिद्ध है।

परिवार पूरी लगन और मेहनत से जीवित रखे हुए

हालांकि आधुनिकता के साथ कुछ परिवारों ने झाड़ू बनाने का यह कार्य छोड़ दिया है, लेकिन अब भी कई घरों में यह परंपरा जीवित है और अगली पीढ़ी को सिखाई जा रही है। यह देपालपुर के लिए केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत भी है, जिसे ये परिवार पूरी लगन और मेहनत से जीवित रखे हुए हैं।

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