जानिए मंदिर का इतिहास...
खजराना गणेश मंदिर का इतिहास 18वीं सदी में पहुंचता है। कहा जाता है कि मुगल शासक औरंगजेब के शासनकाल में जब हिंदू मूर्तियों को तोड़ा जा रहा था, तब मान्यता है कि मूर्ति को एक कुएं में छिपा दिया गया था, ताकि उसे नुकसान न पहुंचे।
कुछ वर्षों बाद, मालवा की मराठा रानी अहिल्याबाई होलकर ने इस मूर्ति को पुनः प्रतिष्ठित करवाया और खजराना क्षेत्र में इस मंदिर का निर्माण कराया। तब से यह मंदिर इंदौरवासियों और देशभर के भक्तों के लिए आस्था का एक अमिट प्रतीक बन गया है।
मूर्ति की खास बात...
खजराना गणेश मंदिर की प्रतिमा की एक अद्भुत विशेषता है — इसका लगातार बढ़ता आकार। मान्यता है कि यह प्रतिमा धीरे-धीरे बड़ी होती जा रही है। गणेश जी की यह प्रतिमा एक खास किस्म की मिट्टी से बनी है जिसमें गुड़, चूना और अन्य पारंपरिक सामग्री का उपयोग हुआ है। वैज्ञानिक तौर पर इसके पीछे मौसमीय प्रभावों की चर्चा होती है, लेकिन भक्त इसे चमत्कार ही मानते हैं।मंदिर में ये भगवान विराजमान..
इस मंदिर में गणेश जी की प्रतिमा के अलावा, माता दुर्गा जी, महाकालेश्वर की भूमिगत शिवलिंग, गंगा जी की मगरमच्छ पर जलधारा मूर्ति, लक्ष्मी जी का मंदिर और हनुमान जी की झांकी भी है।मन्नतों का मंदिर: हर धागे में बंधी होती है एक आस
यहां आने वाले भक्त अपने मन की मुरादें मांगते हैं और पूरी होने पर लाल धागा या चांदी के छत्र, मोदक या सिंदूर चढ़ाते हैं। मंदिर की दीवारों पर हजारों ऐसे धागे बंधे हैं जो श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक हैं। यह विश्वास है कि गणेश जी को यहां से कोई खाली हाथ नहीं लौटता।