लता मंगेशकर की 97वीं जयंती

लता मंगेशकर की 97वीं जयंती: 25 रुपये की पहली फीस से ‘ए मेरे वतन के लोगों’ तक, ऐसी थी सुरों की रानी की कहानी

लता मंगेशकर की 97वीं जयंती पर भारत ने उन्हें याद किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दी। उनकी आवाज ने कई पीढ़ियों को भावनाओं से जोड़ा।

By : सोनिया रायकवार
लता मंगेशकर की 97वीं जयंती: 25 रुपये की पहली फीस से ‘ए मेरे वतन के लोगों’ तक, ऐसी थी सुरों की रानी की कहानी

भारतीय संगीत की दुनिया में लता मंगेशकर का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। उनकी आवाज ने कई पीढ़ियों को भावनाओं से जोड़ा। 28 सितंबर 1929 को इंदौर में जन्मीं लता मंगेशकर ने बेहद कम उम्र में संगीत की साधना शुरू कर दी थी। आज उनकी 97वीं जयंती पर देश उन्हें याद कर रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लता मंगेशकर को श्रद्धांजलि दी है।

प्रधानमंत्री कार्यालय ने 28 सितंबर 2026 को उनके जन्मदिवस पर श्रद्धांजलि का उल्लेख किया है।

लता मंगेशकर के शुरुआती जीवन की कहानी संघर्ष, जिम्मेदारी और लगातार मेहनत से भरी रही। पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर स्वयं जाने-माने शास्त्रीय गायक और रंगमंच कलाकार थे। लता ने बचपन में ही उनसे संगीत की शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी। पिता के निधन के बाद महज 13 साल की उम्र में परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई।

पहली फीस मिली थी सिर्फ 25 रुपये

पिता के निधन के बाद लता मंगेशकर ने फिल्मों में काम करना शुरू किया। शुरुआती दौर में उन्होंने अभिनय भी किया और फिल्मों के लिए गाने भी गाए। उनके शुरुआती फिल्मी सफर से जुड़ा एक चर्चित तथ्य है कि मराठी फिल्म के लिए गाए एक शुरुआती गीत के बदले उन्हें 25 रुपये मिले थे। बाद में उन्होंने प्लेबैक सिंगिंग को अपना मुख्य करियर बनाया।

1947 की फिल्म ‘आप की सेवा में’ से उन्हें हिंदी फिल्मों में प्लेबैक सिंगिंग का महत्वपूर्ण मौका मिला। इसके बाद 1949 में आई फिल्म ‘महल’ के गीत ‘आएगा आनेवाला’ ने उनकी आवाज को देशभर में पहचान दिलाई।

जब आवाज को कहा गया ‘बहुत पतली’

लता के करियर की शुरुआत आसान नहीं थी। शुरुआती दौर में उन्हें कई तरह की आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। एक समय निर्माता शशधर मुखर्जी ने उनकी आवाज को बहुत पतली मानते हुए उन्हें काम देने से इनकार कर दिया था। इसी दौर में संगीतकार मास्टर गुलाम हैदर ने उनकी प्रतिभा पर भरोसा जताया।

गुलाम हैदर ने लता को फिल्म ‘मजबूर’ में गाने का मौका दिया। इसके बाद धीरे-धीरे लता मंगेशकर की आवाज हिंदी सिनेमा की पहचान बनती चली गई। लता ऑनलाइन के संग्रह में भी गुलाम हैदर द्वारा उन्हें शुरुआती महत्वपूर्ण अवसर दिए जाने का उल्लेख मिलता है।

‘ए मेरे वतन के लोगों’ और नेहरू से जुड़ी कहानी

लता मंगेशकर के करियर के सबसे यादगार प्रसंगों में देशभक्ति गीत ‘ए मेरे वतन के लोगों’ भी शामिल है। 1963 में गणतंत्र दिवस के अवसर पर उन्होंने यह गीत प्रस्तुत किया था। कार्यक्रम में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी मौजूद थे। इस प्रस्तुति को लेकर लंबे समय से यह कहानी कही जाती है कि गीत सुनकर नेहरू की आंखों में आंसू आ गए थे। यही वजह है कि यह गीत और लता की आवाज भारतीय संगीत की स्मृतियों में खास जगह बना चुके हैं।

रफी से मतभेद और फिर हुई सुलह

लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी की जोड़ी हिंदी फिल्म संगीत की सबसे चर्चित जोड़ियों में रही। हालांकि एक दौर में दोनों के बीच गानों की रॉयल्टी को लेकर मतभेद हुआ और दोनों ने कुछ वर्षों तक साथ काम नहीं किया। बाद में दोनों के बीच सुलह हुई और उनकी आवाज फिर साथ सुनाई दी। 1960 के दशक में दोनों ने कई यादगार गीत दिए, जिनमें फिल्म ‘ज्वेल थीफ’ का गीत ‘दिल पुकारे आ रे आ रे’ भी शामिल है।

किशोर कुमार से पहली मुलाकात भी रही दिलचस्प

लता मंगेशकर और किशोर कुमार ने भी हिंदी सिनेमा को कई यादगार गीत दिए। दोनों की पहली मुलाकात से जुड़ा किस्सा भी काफी दिलचस्प है। शुरुआती दौर में लता स्टूडियो जाने के लिए लोकल ट्रेन से सफर करती थीं। एक दिन ट्रेन से लेकर स्टूडियो तक एक व्यक्ति उनके पीछे आता रहा। बाद में संगीतकार खेमचंद्र प्रकाश ने बताया कि वह व्यक्ति किशोर कुमार थे।

इसके बाद लता और किशोर कुमार की आवाज कई फिल्मों में साथ सुनाई दी और दोनों की जोड़ी बेहद लोकप्रिय हुई।

‘मुगल-ए-आजम’ का यादगार गीत

1960 की फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ में लता मंगेशकर ने मधुबाला के लिए अपनी आवाज दी। फिल्म का गीत ‘प्यार किया तो डरना क्या’ आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार गीतों में गिना जाता है।

इस गीत की रिकॉर्डिंग को लेकर भी एक दिलचस्प किस्सा सामने आता है। गीत में गूंज का खास प्रभाव पैदा करने के लिए रिकॉर्डिंग की जगह को लेकर प्रयोग किया गया था। यही प्रयोग आगे चलकर गीत की खास पहचान बना।

महबूब खान के लिए फोन पर गाया गीत

लता मंगेशकर की आवाज सिर्फ स्टूडियो रिकॉर्डिंग तक सीमित नहीं थी। उनके बारे में एक चर्चित किस्सा है कि 1958 में अमेरिका में मौजूद फिल्ममेकर महबूब खान की तबीयत खराब होने पर उन्होंने फोन पर उनसे बात की। महबूब खान ने उनसे गाना सुनने की इच्छा जताई, जिसके बाद लता ने फोन पर ‘रसिक बलमा’ सुनाया।

करीब 6,500 गीतों का सफर

लता मंगेशकर ने हिंदी के साथ-साथ मराठी, बंगाली और कई अन्य भाषाओं में गीत गाए। लता ऑनलाइन की जीवनी के अनुसार, उन्होंने अलग-अलग भाषाओं में लगभग 6,500 गीत रिकॉर्ड किए। उनकी आवाज ने छह दशकों से ज्यादा समय तक भारतीय फिल्म संगीत पर गहरी छाप छोड़ी।

उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया और दादासाहेब फाल्के पुरस्कार समेत कई बड़े सम्मान मिले। उनके सम्मान में अयोध्या में लता मंगेशकर चौक भी स्थापित किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 में इसके लोकार्पण के अवसर पर लता मंगेशकर को भारतीय संगीत की महान विभूति बताते हुए श्रद्धांजलि दी थी।

पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन आवाज आज भी कायम

लता मंगेशकर का निधन 6 फरवरी 2022 को हुआ, लेकिन उनकी आवाज आज भी लोगों की यादों में जिंदा है। प्रेम हो, विरह हो, देशभक्ति हो या भक्ति—उनकी आवाज ने भावनाओं के लगभग हर रंग को सुर दिया। यही वजह है कि लता मंगेशकर सिर्फ एक गायिका नहीं, बल्कि भारतीय संगीत और सिनेमा की ऐसी विरासत हैं, जिसकी गूंज आने वाली पीढ़ियों तक सुनाई देती रहेगी।

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