अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की पूर्व मैनेजर दिशा सालियान की मौत के मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने मुंबई पुलिस की जांच के तरीके पर गंभीर सवाल उठाए हैं। गुरुवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस की अब तक की पूरी जांच को ‘निरर्थक’ करार देते हुए पूछा कि आखिर इस मामले को जिस तरह संभाला गया, उसकी कानूनी और जांच संबंधी बुनियाद क्या थी।
यह सुनवाई दिशा के पिता सतीश सालियान की याचिका पर हुई। सतीश का आरोप है कि उनकी बेटी के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया और उसकी हत्या की गई थी। मामले की सुनवाई जस्टिस एसवी कोतवाल और जस्टिस आरआर भोंसले की पीठ कर रही है।
छह साल चली जांच पर कोर्ट ने उठाया सवाल
दिशा सालियान की 8 जून 2020 को मुंबई के मलाड इलाके में एक आवासीय इमारत की 14वीं मंजिल से गिरने के बाद मौत हो गई थी। यह घटना सुशांत सिंह राजपूत की कथित आत्महत्या से करीब एक सप्ताह पहले हुई थी।
दिशा की मौत के बाद पुलिस ने आकस्मिक मृत्यु का मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी। पुलिस ने बाद में निष्कर्ष निकाला था कि उन्होंने आत्महत्या की है। गुरुवार की सुनवाई में अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 174 के तहत हुई ADR जांच की वैधता पर सवाल उठाए।
सरकारी वकील शिशिर हिराय ने अदालत को बताया कि शुरुआती रिपोर्ट फरवरी 2021 में स्वीकार कर ली गई थी। हालांकि, मामले को लेकर उठ रहे सार्वजनिक संदेह के बाद दिसंबर 2023 में जांच को दोबारा आकलन के लिए खोला गया।
इस पर पीठ ने पूछा कि CrPC की धारा 174 के तहत जांच को दोबारा शुरू करने का कानूनी आधार क्या था। अदालत ने कहा कि यह मामला ‘ग्रे एरिया’ में है। पीठ ने यह भी सवाल किया कि छह साल तक चली जांच की आखिर क्या प्रासंगिकता रह जाती है, जब पूरी कवायद ही बेकार साबित हो जाए।
CCTV और गवाहों के बयानों पर भी सवाल
अदालत ने शुरुआती घटनास्थल जांच में कथित कमियों की ओर भी इशारा किया। पीठ ने कहा कि उस सटीक स्थान को कवर करने वाला कोई प्रत्यक्ष CCTV फुटेज उपलब्ध नहीं था, जहां से दिशा कथित तौर पर नीचे गिरी थीं।
गवाहों के बयानों में एक दरवाजे के बंद होने का उल्लेख था, लेकिन पंचनामा में दरवाजे को नुकसान पहुंचने का कोई संबंधित रिकॉर्ड नहीं मिला। अदालत ने यह भी कहा कि ADR जांच के दौरान दर्ज किए गए बयानों का वही साक्ष्य मूल्य नहीं हो सकता, जो आपराधिक जांच के दौरान जुटाए गए सबूतों का होता है।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर भी अदालत की नजर
पीठ ने दिशा के पोस्टमार्टम को लेकर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि राज्य के दिशानिर्देशों के अनुसार ऐसे मामलों में पोस्टमार्टम दो डॉक्टरों द्वारा किया जाना चाहिए, जबकि दिशा का पोस्टमार्टम कथित तौर पर एक डॉक्टर ने किया था।
रिपोर्ट के मुताबिक पोस्टमार्टम मौत के करीब तीन दिन बाद हुआ था। इसमें सिर, पैरों, हाथों और छाती पर चोटों का उल्लेख था तथा सिर की चोट को मौत का कारण बताया गया था। मुंह और नाक से खून निकलने की बात भी रिपोर्ट में दर्ज थी। सुनवाई के दौरान उद्धृत रिपोर्ट में यौन उत्पीड़न या दुष्कर्म का कोई सबूत नहीं मिलने की बात कही गई।
‘FIR का रास्ता अब भी खुला’
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि परिस्थितियां उचित होने पर पुलिस FIR दर्ज कर नए सिरे से जांच कर सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि सतीश सालियान पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट को सक्षम अदालत में चुनौती दे सकते हैं।
सरकार की ओर से यह सवाल उठाए जाने पर कि सतीश अपनी बेटी की मौत के चार साल बाद अदालत क्यों पहुंचे, पीठ ने उनके मानसिक हालात को ध्यान में रखने की बात कही। अदालत ने कहा कि वह सदमे की स्थिति में थे और औपचारिक जांच का रास्ता पूरी तरह बंद क्यों किया जाए।

मामले से जुड़े राजनीतिक विवाद से खुद को अलग रखते हुए पीठ ने साफ कहा कि उसे नेताओं की चिंता नहीं है, बल्कि वह सतीश सालियान के मामले पर केंद्रित है।