नक्सली कमांडर हिड़मा की मौत के बाद बस्तर में कनवर्जन का खेल

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नक्सली कमांडर हिड़मा की मौत के बाद बस्तर में कनवर्जन का खेल

नक्सली कमांडर हिड़मा की मौत के बाद बस्तर में कनवर्जन का खेल

बस्तर में नक्सल हिंसा के साए के बीच अब एक नया और संवेदनशील सवाल उठ खड़ा हुआ है। कुख्यात नक्सली कमांडर हिड़मा की मौत के बाद उसके अंत्येष्टि स्थल पर बाहरी लोगों की मौजूदगी ने इलाके में कनवर्जन को लेकर चर्चाओं को हवा दे दी है। गांव-गांव यही पूछा जा रहा है कि आखिर ये लोग कौन थे, और किस मकसद से पहुंचे थे।

हिड़मा की मौत के बाद उठा विवाद?

सुकमा जिले के ग्राम पूवर्ती निवासी नक्सली कमांडर हिड़मा और उसकी पत्नी राजे को हाल ही में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मार गिराया गया था। वैधानिक प्रक्रिया के बाद दोनों का अंतिम संस्कार गांव के श्मशान घाट में किया गया। मामला तब तूल पकड़ गया, जब दो दिन पहले आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से आए करीब 80 लोग हिड़मा दंपत्ति की कब्र पर तथाकथित ‘दीनकर्म’ करते देखे गए।ग्रामीणों ने इस पर आपत्ति जताई और पुलिस को सूचना दी। मौके पर पहुंची पुलिस ने सभी बाहरी लोगों को सुकमा जिला मुख्यालय ले जाकर पूछताछ की, हालांकि अगली सुबह उन्हें छोड़ दिया गया।

कनवर्जन और फंडिंग को लेकर सवाल

इसी घटना के बाद इलाके में यह सवाल तेज हो गया कि क्या हिड़मा ने धर्म परिवर्तन किया था। क्या वह किसी मिशनरी नेटवर्क से जुड़ चुका था, और क्या नक्सली संगठनों को इसके लिए बाहरी या विदेशी फंडिंग मिल रही थी।सोशल मीडिया पर हिड़मा के समर्थकों द्वारा डाली गई कुछ रील्स, पोस्ट और गीतों ने इन शंकाओं को और बढ़ाया है। इनमें उसे ‘मसीहा’ की तरह पेश किया गया है। हाल ही में सर्व आदिवासी समाज के एक कार्यक्रम में ऐसा ही एक गीत सामने आया था, जिसकी पुलिस अधीक्षक स्तर पर जांच भी हुई, हालांकि बाद में मामला ठंडे बस्ते में चला गया।

ग्रामीणों का दावा

पूवर्ती अंचल के ग्रामीणों का कहना है कि जो लोग दीनकर्म के नाम पर पहुंचे थे, वे किसी धर्म विशेष से जुड़े थे। यही वजह है कि नक्सलियों और कनवर्जन गतिविधियों के संभावित रिश्ते को लेकर चर्चा और गहरी हो गई है।इस पूरे मामले ने स्थानीय प्रशासन और खुफिया एजेंसियों के लिए भी नई चुनौती खड़ी कर दी है, क्योंकि बस्तर पहले ही संवेदनशील इलाका माना जाता है।

हिंदू प्रतिमाएं ही क्यों निशाने पर?

स्थानीय लोग एक और पहलू की ओर इशारा कर रहे हैं। उनका कहना है कि सुदूर बस्तर के जंगलों में नक्सलियों ने कभी किसी चर्च को निशाना नहीं बनाया, जबकि बारसूर की पहाड़ी पर भगवान गणेश की अति प्राचीन शिवलिंग और दुर्गाजी की प्रतिमाओं को खंडित करने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं.आदिवासी समाज में भगवान भोलेनाथ और आदिशक्ति मां दुर्गा आराध्य माने जाते हैं। ऐसे में धार्मिक प्रतीकों पर हमले और कनवर्जन से जुड़ी आशंकाएं लोगों की चिंता बढ़ा रही हैं।  

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