कन्नप्पा नायनार की अद्भुत कथा

शिवलिंग पर चढ़ाया मांस, मुंह के जल से किया अभिषेक! जानिए भगवान शिव के अनोखे भक्त कन्नप्पा नायनार की अद्भुत कथा

कन्नप्पा नायनार, एक शिकारी जिन्होंने अपनी निष्कपट भक्ति और समर्पण से भगवान शिव को प्रसन्न किया और मोक्ष प्राप्त किया।

By : सोनिया रायकवार
शिवलिंग पर चढ़ाया मांस, मुंह के जल से किया अभिषेक! जानिए भगवान शिव के अनोखे भक्त कन्नप्पा नायनार की अद्भुत कथा

सावन का पावन महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे शुभ माना जाता है। इस दौरान भक्त गंगाजल, दूध, पंचामृत, बेलपत्र, धतूरा और भांग अर्पित कर भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव के एक ऐसे भक्त भी हुए, जिन्होंने शिवलिंग पर मांस चढ़ाया, अपने मुंह में भरकर लाए पानी से जलाभिषेक किया और अंत में अपनी आंखें तक भगवान को अर्पित करने के लिए तैयार हो गए। यह अद्भुत कथा है भगवान शिव के परम भक्त कन्नप्पा नायनार की, जिन्हें आज भी शिवभक्ति का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है।

कौन थे कन्नप्पा नायनार?

कन्नप्पा नायनार दक्षिण भारत के जंगलों में रहने वाले एक शिकारी थे। उनका जीवन पूरी तरह शिकार पर निर्भर था। वे न तो वेद-पुराणों के ज्ञाता थे और न ही उन्हें मंत्र, पूजा-विधि या धार्मिक अनुष्ठानों की जानकारी थी। लेकिन उनके हृदय में भगवान शिव के प्रति अटूट श्रद्धा और निष्कपट प्रेम था। यही सच्ची भक्ति उन्हें भगवान शिव के सबसे प्रिय भक्तों में शामिल करती है।

ऐसे हुई शिवभक्ति की शुरुआत

पौराणिक कथा के अनुसार, एक दिन शिकार की तलाश में जंगल में घूमते हुए कन्नप्पा की नजर एक शिवलिंग पर पड़ी। उसे देखते ही उनके मन में यह विश्वास जागा कि यह कोई साधारण पत्थर नहीं, बल्कि स्वयं महादेव का स्वरूप है। उसी क्षण उन्होंने संकल्प लिया कि वे प्रतिदिन इस शिवलिंग की सेवा और पूजा करेंगे।

मांस का भोग और मुंह के जल से अभिषेक

कन्नप्पा के पास पूजा की कोई सामग्री नहीं थी। उनका जीवन शिकार पर आधारित था, इसलिए वे अपने शिकार का सबसे अच्छा हिस्सा भगवान शिव को अर्पित करते थे और शेष स्वयं ग्रहण करते थे।

पानी रखने के लिए उनके पास कोई पात्र भी नहीं था। ऐसे में वे अपने मुंह में पानी भरकर लाते और उसी जल से शिवलिंग का अभिषेक करते थे। इसके अलावा वे अपने हाथों से शिवलिंग और उसके आसपास की सफाई भी करते थे। पारंपरिक दृष्टि से उनकी पूजा भले ही असामान्य थी, लेकिन उसमें दिखावा, अहंकार या स्वार्थ का कोई स्थान नहीं था। उनकी पूजा केवल प्रेम, विश्वास और समर्पण से भरी हुई थी।

जब भगवान शिव ने ली अपने भक्त की परीक्षा

एक दिन कन्नप्पा ने देखा कि शिवलिंग की एक आंख से रक्त बह रहा है। अपने आराध्य को पीड़ा में देखकर उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी एक आंख निकालकर शिवलिंग पर अर्पित कर दी।

कुछ देर बाद उन्होंने देखा कि शिवलिंग की दूसरी आंख से भी रक्त बहने लगा। तब उन्होंने अपनी दूसरी आंख भी अर्पित करने का निश्चय किया। लेकिन दूसरी आंख निकालने से पहले उन्होंने अपना पैर उस स्थान पर रख दिया, ताकि दृष्टि समाप्त होने के बाद भी वे सही स्थान पर आंख अर्पित कर सकें।

जैसे ही वे अपनी दूसरी आंख निकालने लगे, उसी क्षण भगवान शिव स्वयं प्रकट हो गए। महादेव ने उनका हाथ पकड़ लिया और उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। भगवान शिव उनकी निष्कपट भक्ति और अद्वितीय समर्पण से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने कन्नप्पा को अपना परम भक्त स्वीकार किया और उन्हें मोक्ष का वरदान प्रदान किया।

श्रीकालहस्ती मंदिर से जुड़ी है यह अमर कथा

आंध्र प्रदेश का प्रसिद्ध श्रीकालहस्ती मंदिर कन्नप्पा नायनार की इस दिव्य कथा से जुड़ा हुआ माना जाता है। आज भी लाखों श्रद्धालु यहां भगवान शिव के साथ-साथ उनके महान भक्त कन्नप्पा को श्रद्धापूर्वक नमन करने पहुंचते हैं।

कथा का संदेश

कन्नप्पा नायनार की कथा हमें यह सिखाती है कि भगवान शिव के लिए बाहरी आडंबर, महंगी पूजा सामग्री या जटिल विधि-विधान से अधिक महत्व सच्चे मन, निष्कपट प्रेम, अटूट विश्वास और पूर्ण समर्पण का होता है। यदि भक्ति में छल-कपट न हो, तो भगवान स्वयं अपने भक्त की पुकार सुनते हैं और उसकी रक्षा के लिए प्रकट हो जाते हैं। यही कारण है कि कन्नप्पा नायनार आज भी शिवभक्ति के सबसे महान प्रतीकों में गिने जाते हैं।

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