चुनावी साल नजदीक आते ही हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार में सियासी हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू, उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री और कैबिनेट के कुछ अन्य मंत्री इन दिनों दिल्ली में हैं। मुख्यमंत्री का दिल्ली दौरा भले ही केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों से हिमाचल के हितों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के लिए बताया जा रहा हो, लेकिन पार्टी हाईकमान के साथ संभावित राजनीतिक मंथन ने इस दौरे को और अहम बना दिया है।
दिल्ली से निकलकर सामने आ रही सियासी चर्चाओं के मुताबिक, सुक्खू सरकार की कैबिनेट में बड़ा बदलाव हो सकता है और सितंबर के अंत तक यानी 30 सितंबर तक मंत्रिमंडल नए स्वरूप में दिखाई दे सकता है।
सुंदर ठाकुर की खुलेगी किस्मत या किसी मंत्री की होगी छुट्टी?
कैबिनेट विस्तार की चर्चा में कुल्लू विधायक और मुख्यमंत्री के करीबी सहयोगी सुंदर ठाकुर का नाम लंबे समय से सामने आता रहा है। मुख्यमंत्री खुद सार्वजनिक तौर पर उनके मंत्री बनने की संभावना का उल्लेख कर चुके हैं, लेकिन अब तक उन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली है।
बताया जा रहा है कि सुंदर ठाकुर की राह में सबसे बड़ी चुनौती कैबिनेट में जातीय संतुलन को लेकर है। एक और राजपूत मंत्री को शामिल करने से संतुलन प्रभावित होने की आशंका के चलते पार्टी के भीतर इस पर चर्चा हुई है।
इसी बीच संजय रत्न, संजय अवस्थी और आशीष बुटेल के नाम भी संभावित मंत्रियों की सूची में फिर मजबूत होते दिखाई दे रहे हैं। हालांकि, इन नामों को जगह देने के लिए मौजूदा मंत्रिमंडल से किसी सदस्य को हटाना पड़ सकता है। इस संभावित बदलाव की चर्चा में वरिष्ठ मंत्री कर्नल धनीराम शांडिल का नाम अक्सर सामने आता रहा है।
हाईकमान के पास पहुंची हिमाचल की रिपोर्ट
चुनावी साल से पहले कांग्रेस संगठन की ओर से राज्य की राजनीतिक स्थिति का आकलन भी किया गया है। पार्टी प्रभारी रजनी पाटिल ने हिमाचल के नेताओं से व्यक्तिगत और आमने-सामने मुलाकात कर फीडबैक लिया। इसी आधार पर तैयार रिपोर्ट हाईकमान को सौंपी गई।
सूत्रों के मुताबिक, हाईकमान ने रिपोर्ट के विभिन्न पहलुओं को लेकर मुख्यमंत्री सुक्खू और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष विनय कुमार के साथ चर्चा की है। रिपोर्ट में सरकार के सामने मौजूद एंटी-इंकम्बेंसी फैक्टर पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। पार्टी की कोशिश है कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले ऐसे कदम उठाए जाएं, जिससे कांग्रेस के मिशन रिपीट की संभावनाएं मजबूत हो सकें।
पांच साल बाद सत्ता बदलने की परंपरा बनी चुनौती
हिमाचल प्रदेश में आमतौर पर हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन का इतिहास रहा है। वरिष्ठ मीडिया कर्मी धनंजय शर्मा का कहना है कि वीरभद्र सिंह और प्रेम कुमार धूमल जैसे दिग्गज नेता भी इस परंपरा को बदल नहीं सके।
दूसरी ओर, राज्य की खराब आर्थिक स्थिति भी सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। कर्मचारियों की अपेक्षाओं को पूरा करने के साथ विकास कार्यों के लिए संसाधन जुटाना आसान नहीं है। कांग्रेस के मिशन रिपीट के सामने यही आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियां बड़ा पेंच बनी हुई हैं।
दिल्ली दौरे के बाद खुलेगा सियासी पत्तों का राज

मुख्यमंत्री सुक्खू के प्रदेश लौटने से पहले दिल्ली में कांग्रेस नेतृत्व के साथ क्या बातचीत हुई, इसे लेकर फिलहाल तस्वीर साफ नहीं है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ संभावित चर्चा में सरकार को कोई सख्त संदेश मिलता है या चुनावी रणनीति का कोई नया राजनीतिक मंत्र, इसका पता मुख्यमंत्री के लौटने के बाद ही चलेगा।
फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि दिल्ली दौरे के बाद हिमाचल की राजनीति में हलचल और बढ़ सकती है और सितंबर के अंत तक सुक्खू कैबिनेट का नया चेहरा सामने आने की संभावना है।