राजधानी भोपाल के कोलार इलाके में साइबर ठगी का हैरान करने वाला मामला सामने आया है। ठगों ने बुजुर्ग दंपती को 96 दिनों तक डिजिटल अरेस्ट के नाम पर डराकर रखा। आरोपियों ने खुद को दिल्ली पुलिस अधिकारी, चीफ इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर और सुप्रीम कोर्ट का जज बताकर दंपती को करोड़ों रुपये के मनी लॉन्ड्रिंग केस में फंसाने की धमकी दी।
गिरफ्तारी और संपत्ति सीज होने के डर से दंपती ने अपने जेवर गिरवी रखकर 22 लाख रुपये जुटाए और ठगों के बताए बैंक खातों में पांच बार रकम जमा कर दी। इसके बावजूद आरोपियों ने उन्हें नहीं छोड़ा।
दिल्ली पुलिस अधिकारी बनकर आया पहला फोन
पुलिस के मुताबिक, कृष्णा कॉम्प्लेक्स गणपति एन्क्लेव निवासी सुवर्णा लक्ष्मी और नरसिम्हा राव मूल रूप से आंध्र प्रदेश के पलनाडू जिले के रहने वाले हैं।
19 मई को सुवर्णा लक्ष्मी के मोबाइल पर एक कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को दिल्ली के दरियागंज थाने का अधिकारी ‘खन्ना’ बताया। उसने दावा किया कि दंपती के नाम गिरफ्तारी वारंट जारी है और दिल्ली केनरा बैंक खाते के जरिए नरेश गोयल से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में करोड़ों रुपये के लेनदेन का आरोप है। इसके बाद ठगों ने वीडियो कॉल के जरिए दंपती से पूछताछ शुरू कर दी।
घर से निकलने और किसी से बात करने पर रोक
आरोपियों ने दंपती को लगातार वीडियो कॉल पर रहने के लिए मजबूर किया। उन्हें किसी अन्य व्यक्ति से बात करने और घर से बाहर निकलने से भी रोका गया। 21 मई को एक महिला ने खुद को चीफ इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर बताया और दंपती से उनके बैंक खातों से जुड़ी जानकारी ली। अगले दिन आरोपियों ने वीडियो कॉल पर एक व्यक्ति को फर्जी जज बनाकर दंपती से बात कराई। फर्जी जज ने दंपती को उनके आधार कार्ड की जानकारी दिखाकर कार्रवाई का डर पैदा किया।
‘संपत्ति सीज हो जाएगी’ कहकर डराया
9 जून को कथित फर्जी जज ने दंपती को संपत्ति सीज करने का आदेश सुनाने का दावा किया। इसके बाद ‘निशा पटेल’ नाम की महिला ने उन्हें भोपाल वापस लौटने के लिए कहा। आरोपियों ने दंपती से कहा कि अगर मामला खत्म करना है तो उन्हें अपनी एफडी और जेवर बेचने या गिरवी रखने होंगे।
जेवर गिरवी रखकर जुटाए 22 लाख
दंपती 10 जून को आंध्र प्रदेश से रवाना होकर 11 जून को भोपाल पहुंचे। अगले दिन, 12 जून को उन्होंने अपने जेवर गिरवी रखकर 22 लाख रुपये जुटाए। आरोपियों के निर्देश पर यह रकम अलग-अलग बैंक खातों में पांच बार जमा की गई। ठगों ने दंपती से संपर्क बनाए रखने के लिए 7 अलग-अलग WhatsApp नंबरों का इस्तेमाल किया। लेकिन 22 लाख रुपये देने के बाद भी ठगी का सिलसिला खत्म नहीं हुआ। दंपती को लगातार वीडियो कॉल के जरिए निगरानी में रखा गया।
96 दिन तक चलता रहा डिजिटल अरेस्ट
पुलिस के अनुसार, 19 मई से 23 अगस्त तक दंपती इस पूरे घटनाक्रम का सामना करते रहे। यानी करीब 96 दिनों तक उन्हें डिजिटल अरेस्ट के नाम पर डर और मानसिक दबाव में रखा गया। बाद में दंपती को पूरे मामले पर संदेह हुआ। उन्होंने जब मामले की जानकारी जुटाई तो पता चला कि सुप्रीम कोर्ट के नाम पर दिखाया गया आदेश फर्जी था।
27 अगस्त को दर्ज हुई FIR
ठगी का अहसास होने के बाद बुजुर्ग दंपती ने साइबर सेल में शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद 27 अगस्त को FIR दर्ज की गई और केस की डायरी कोलार थाने भेजी गई। पुलिस अब मामले की जांच में जुटी है। जांच के दायरे में आरोपियों के सात WhatsApp नंबर, वीडियो कॉल और पांच अलग-अलग बैंक खातों में हुए ट्रांजैक्शन शामिल हैं। यह मामला एक बार फिर दिखाता है कि साइबर ठग किस तरह पुलिस, जांच एजेंसी और न्यायपालिका के नाम का इस्तेमाल कर लोगों में डर पैदा करते हैं। किसी भी फोन कॉल या वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी से बचने के नाम पर पैसे मांगने पर तुरंत सावधान होना जरूरी है।