बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी में प्रशासनिक संकट, 34 दिन में दूसरे कुलगुरु का इस्तीफा

बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी में संकट

बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी में प्रशासनिक संकट, 34 दिन में दूसरे कुलगुरु का इस्तीफा

भोपाल की बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी में प्रशासनिक अस्थिरता। दो कुलगुरुओं ने एक महीने के अंदर पद छोड़ा, अनुपम राजन को अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया।

बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी में प्रशासनिक संकट 34 दिन में दूसरे कुलगुरु का इस्तीफा

भोपाल की बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी (BU) में प्रशासनिक अस्थिरता का दौर जारी है। महज 34 दिनों के भीतर विश्वविद्यालय के दूसरे कुलगुरु ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। प्रभारी कुलगुरु प्रो. विवेक शर्मा ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए पद छोड़ दिया, जिसे राज्यपाल मंगूभाई पटेल ने स्वीकार कर लिया है। लगातार हो रहे बदलावों के कारण विश्वविद्यालय की व्यवस्था और कामकाज को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

अनुपम राजन को सौंपा गया अतिरिक्त प्रभार

प्रो. विवेक शर्मा के इस्तीफे के बाद अब नियमित कुलगुरु की नियुक्ति होने तक उच्च शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव अनुपम राजन को बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। शासन ने यह व्यवस्था विश्वविद्यालय के प्रशासनिक कामकाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए की है। अब सभी की नजरें नए नियमित कुलगुरु की नियुक्ति पर टिकी हैं।

विवादों से घिरी रही यूनिवर्सिटी

बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी पिछले कुछ समय से लगातार विवादों में रही है। परिसर में कथित अनियमितताओं और प्रशासनिक फैसलों को लेकर छात्रों और संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किया था। 11 जून को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने यूनिवर्सिटी परिसर में अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया था। छात्रों ने कई मुद्दों को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ आवाज उठाई थी।

पहले कुलगुरु एसके जैन ने दिया था इस्तीफा

विवाद बढ़ने के बाद उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने तत्कालीन कुलगुरु प्रो. एसके जैन को फोर्स लीव पर भेजने की बात कही थी। इसके बाद 18 जून को प्रो. एसके जैन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। 19 जून को प्रो. विवेक शर्मा को विश्वविद्यालय का प्रभारी कुलगुरु नियुक्त किया गया था, लेकिन करीब एक महीने बाद उन्होंने भी पद छोड़ दिया।

नियमित कुलगुरु की नियुक्ति का इंतजार

लगातार दो कुलगुरुओं के इस्तीफे के बाद बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी में प्रशासनिक स्थिरता को लेकर चिंता बढ़ गई है। छात्रों की पढ़ाई, परीक्षाओं, शोध कार्य और रोजमर्रा के प्रशासनिक कामों पर भी इसका असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। अब बड़ा सवाल यह है कि शासन नियमित कुलगुरु की नियुक्ति कब तक करता है और विश्वविद्यालय में स्थायी नेतृत्व कब लौटेगा।

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