अलवर नगर निगम चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने अपना प्रचार अभियान तेज कर दिया है। इसी कड़ी में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा 7 सितंबर को अलवर पहुंचेंगे। खास बात यह है कि वार्ड पार्षदों के चुनाव में शहर के भीतर पहली बार मुख्यमंत्री का रोड शो आयोजित किया जा रहा है। इस दौरान सीएम भाजपा प्रत्याशियों के समर्थन में प्रचार करते हुए मतदाताओं से वोट की अपील करेंगे। मुख्यमंत्री के कार्यक्रम का विस्तृत शेड्यूल अभी सामने आना बाकी है। वहीं भाजपा के इस बड़े चुनावी कार्यक्रम के जवाब में कांग्रेस ने भी अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली और पूर्व केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह अलवर में पार्टी के प्रचार अभियान को मजबूत करने में जुटे हैं।
BJP ने झोंकी ताकत
अलवर नगर निगम चुनाव में मेयर की कुर्सी पर कब्जे को लेकर भाजपा ने पूरी ताकत लगा दी है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के साथ केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और वन राज्य मंत्री संजय शर्मा भी रोड शो में शामिल होंगे। चुनाव प्रचार के बाद 9 सितंबर को मतदान होगा। इसके बाद निर्वाचित पार्षद मेयर और डिप्टी मेयर का चुनाव करेंगे। ऐसे में हर वार्ड के नतीजे महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं, क्योंकि मेयर की तस्वीर काफी हद तक पार्षदों के आंकड़े पर निर्भर करेगी।
GEN-Z पर नजर
इस बार अलवर के निकाय चुनाव में युवा मतदाताओं की भूमिका भी चर्चा में है। देश के अलग-अलग हिस्सों में GEN-Z से जुड़े आंदोलनों के बाद राजस्थान के इन निकाय चुनावों पर भी राजनीतिक दलों और विश्लेषकों की नजर है। भाजपा इन चुनावों को अपने पक्ष में करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। पार्टी के लिए यह चुनाव स्थानीय स्तर पर पकड़ मजबूत करने के साथ सरकार के प्रति जनता के रुख को समझने का मौका भी माना जा रहा है। हालांकि, युवा मतदाताओं का वास्तविक असर चुनाव परिणाम आने के बाद ही साफ हो पाएगा।
65 वार्ड, 344 प्रत्याशी
अलवर नगर निगम बनने के बाद यह पहला नगर निगम चुनाव है। कुल 65 वार्डों में 344 प्रत्याशी मैदान में हैं। कांग्रेस के एक प्रत्याशी का नामांकन खारिज होने के कारण पार्टी के उम्मीदवारों की संख्या एक कम हो गई है। इससे पहले जब अलवर में नगर परिषद के चुनाव हुए थे, तब भी 65 वार्ड थे। उस चुनाव में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद भाजपा के 27 पार्षद जीतकर आए थे, जबकि कांग्रेस के 19 प्रत्याशी विजयी हुए थे। इसके बावजूद कांग्रेस अपना सभापति बनाने में कामयाब रही थी। बाद में कांग्रेस की सभापति एसीबी की कार्रवाई में ट्रैप हुईं, जिसके बाद भाजपा के उपसभापति को सभापति की जिम्मेदारी मिली। नगर निगम बनने के बाद इसी पद को मेयर के नाम से जाना जाने लगा। अब निगम बनने के बाद पहली बार जनता सीधे पार्षदों का चुनाव करेगी।
मैदान में बड़े नेताओं के करीबी
इस चुनाव में कई राजनीतिक परिवारों से जुड़ी महिलाएं भी पार्षद पद के लिए मैदान में हैं। मेयर की सीट महिला के लिए आरक्षित होने के कारण प्रमुख नेताओं ने अपने परिवार की महिलाओं को चुनाव मैदान में उतारा है। वहीं कई वार्डों में नेताओं के करीबी और लंबे समय से पार्टी के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं को भी टिकट दिया गया है। चुनाव परिणाम के बाद सबसे ज्यादा नजर इस बात पर होगी कि किस पार्टी के कितने पार्षद जीतकर आते हैं। मेयर पद के लिए उम्मीदवार तय करने में यही संख्या सबसे अहम होगी। हालांकि, पिछले चुनाव का उदाहरण बताता है कि सिर्फ ज्यादा सीटें जीतना ही मेयर की कुर्सी की गारंटी नहीं है। राजनीतिक समीकरण और पार्षदों के समर्थन से भी अंतिम तस्वीर बदल सकती है।