स्वयंभू रूप में प्रकट हुई थीं वनदेवी...
मंदिर के पुजारी और स्थानीय लोगों का कहना है कि बगदाई वनदेवी की प्रतिमा स्वयंभू है। किसी को नहीं पता कि यह प्रतिमा वहां कैसे प्रकट हुई। मान्यता है कि एक जमींदार को देवी ने स्वप्न में दर्शन दिए थे, जिसके बाद उन्होंने यहां एक छोटा मंदिर बनवाया। समय के साथ श्रद्धालुओं की आस्था बढ़ती गई और आज यह मंदिर लोक आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है।
भक्तों का अटूट विश्वास और चमत्कारिक अनुभव...
भक्तों के अनुसार, देवी वनदेवी हर सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना को पूरा करती हैं। भक्त रुखमणि वैष्णव बताती हैं – “मैंने पांच पत्थर रखकर देवी से प्रार्थना की थी, और जब मेरी मनोकामना पूरी हुई तो दोबारा पत्थर चढ़ाने आई।” एक अन्य भक्त सुनीता मिश्रा बताती हैं – “साल 2008 में संतान प्राप्ति की इच्छा से पत्थर चढ़ाए थे, और देवी की कृपा से मुझे बेटा और बेटी दोनों हुए। तब से मैं हर नवरात्रि में यहां ज्योति कलश जलवाती हूं।”नवरात्रि पर उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़....
हर साल शारदीय और चैत्र नवरात्रि में मंदिर में भारी भीड़ उमड़ती है। देवी को “वनदेवी” कहा जाता है क्योंकि यह स्थान पहले घने जंगलों से घिरा हुआ क्षेत्र था।
करीब एक सदी पहले यहां से गुजरने वाले लोग पांच पत्थर रखकर अपनी मनोकामना मांगते थे और सुरक्षित अपने गंतव्य तक पहुंच जाते थे। यह परंपरा अब पूरे क्षेत्र में आस्था का प्रतीक बन चुकी है।
आस्था और परंपरा का सुंदर संगम....
आज बगदाई वनदेवी मंदिर न केवल बिलासपुर बल्कि आसपास के जिलों में भी श्रद्धा और चमत्कार का प्रतीक माना जाता है। पत्थर चढ़ाने की यह अनोखी परंपरा भक्ति, विश्वास और देवी की कृपा का प्रतीक है — जो यह संदेश देती है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती।