बंदूक, तोपें..मेनार गांव की ऐतिहासिक बारूद की होली

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बंदूक, तोपें..मेनार गांव की ऐतिहासिक बारूद की होली

बंदूक तोपेंमेनार गांव की ऐतिहासिक बारूद की होली

Holi Menar Village: लाल पगड़ियों और सजे-धजे कपड़ों में आधी रात को हाथों में तलवारें लिए लोग खड़े थे। चारों तरफ आग उगलती तोपें थीं। लगातार धमाकों की आवाज ने माहौल को रोमांचित कर दिया था। गोलियां चलाई जा रही थीं और ऐसा लग रहा था मानो किसी ऐतिहासिक युद्ध का दृश्य हो।

मेनार गांव की परंपरा

मेनार गांव की परंपरा

ये नजारा था उदयपुर से लगभग 45 किलोमीटर दूर उदयपुर-चित्तौड़गढ़ नेशनल हाईवे पर स्थित मेनार गांव का। ये एक परंपरा है जो हर साल निभाई जाती है। इस आयोजन की खास बात यह है कि इसमें केवल युवा ही नहीं बुजुर्ग भी पूरे जोश के साथ भाग लेते हैं। गांव के बड़े-बुजुर्ग युवाओं के साथ मिलकर धमाके करते हैं और पारंपरिक ढोल-दुंदुभि की धुन पर माहौल को उत्सव में बदल देते हैं।

 451 साल पुरानी परंपरा

करीब 451 साल पहले मुगल चौकी ध्वस्त करने की खुशी में मेनारिया ब्राह्मण समाज के लोग बारूद की होली खेलते है। हर साल होलिका दहन के 48 घंटे बाद यानि तीसरी रात (जमरा बीज) पर यह आयोजन होता है। तलवारों के साथ गैर नृत्य किया जाता है। मशाल लेकर गांव के रास्तों की मोर्चाबंदी कर दी जाती है। यह सब देखने के लिए महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश यहा तक की विदेशों तक से लोग मेनार गांव पहुंचते है।

इस साल भी मेनार में 4 मार्च की आधी रात को यह जश्न मनाया गया। समाज के लोग बंदूक तोपे लेकर चौक में पहुंचे, और परंपरा को निभाते हुए गोले बारूद चलाए गए। इस दौरान बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ थी। पूरी रात धमाकों की आवाज सुनाई दे रही थी। 

[caption id="attachment_138818" align="alignnone" width="1194"]ओंकारेश्वर मंदिर के चौक पर बारूद की होली ओंकारेश्वर मंदिर के चौक पर बारूद की होली[/caption]

क्यों मनाई जाती है बारूद की होली?

Holi Menar Village: कहा जाता है मेवाड़ में महाराणा अमर सिंह के राज के दौरान जगह-जगह मुगलों की छावनियां बनी हुई थीं। मेनार गांव के पूर्वी छोर पर भी मुगलों की छावनी थी। छावनी के आतंक से लोग काफी परेशान थे। मेनारिया ब्राह्मणों की परेशानियां बढ़ने लगी। इसके बाद जब मेनारवासियों को वल्लभनगर छावनी पर जीत का समाचार मिला तो गांव के लोग ओंकारेश्वर चबूतरे पर जुटे और छावनी पर हमले की रणनीति बनाई। इसके बाद हमला कर मुगल छावनी को ध्वस्त कर दिया गया। 

मेनार में जमरा बीज की रात का माहौल युद्ध स्थल से कम नहीं था। चारों तरफ भीड़, पैर रखने की जगह नहीं। गांव के लोगों ने सेना वाली पोशाक पहनते है। हाथों में मशाल और तलवारें थीं। टुकड़ियां जब बारूद की होली खेलने के लिए ओंकारेश्वर चौक पहुंचीं तो शोर मच गया। 

[caption id="attachment_138820" align="alignnone" width="1148"]रातभर चली तोपें रातभर चली तोपें[/caption]

Holi Menar Village: जीत का जश्न

देखते ही देखते तोपें बारूद उगलने लगीं। गोला-बारूद से पूरा इलाका दहल गया। दुंदुभि बजाकर जीत का ऐलान किया गया और फिर तलवारों से गैर नृत्य शुरू हुआ। मुगल चौकी पर जीत के बाद से मेनारिया समाज हर साल इसी तरह होली मनाता है। खास बात यह है कि इसमें रंग से ज्यादा बारूद से होली खेली जाती है।

ओंकारेश्वर मंदिर चौक पर रस्में

4 मार्च दोपहर ऐतिहासिक बारूद की होली की शुरुआत हुई। सबसे पहले गांव के ही ओंकारेश्वर मंदिर के चौक में शाही लाल जाजम बिछाई गई। गांव और आसपास के इलाकों से यहां पहुंचे मेनारिया ब्राह्मण समाज के पंचों, बुजुर्गों का स्वागत किया गया। उनकी मेहमाननवाजी की गई। इसके बाद गांव के जैन समाज के लोगों ने गुलाल बरसाना शुरू किया। 

 

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5 टुकड़ियां 5 मशालें

रात 10:15 बजे के बाद रस्मों की शुरूआत हुईं। पूर्व रजवाड़ों के सदस्य सैनिकों की पोशाक धोती-कुर्ता और साफा बांधे तलवारें और बंदूकें लेकर घरों से निकले। अलग-अलग रास्तों से ललकारते हुए गोलियां दागते-तलवारें लहराते हुए ओंकारेश्वर चौक पहुंचे। यहां चबूतरे पर गांव के 5 रास्तों की मोर्चाबंदी का हुकुम दिया गया। 5 टुकड़ियां 5 मशालें लेकर ढोल की थाप पर गांव की मोर्चाबंदी करने के लिए रवाना हो गईं। पांचों दलों ने शोर करते हुए जब एक साथ कूच किया तो आनंद चरम पर पहुंच गया। हजारों लोग इस नजारे के गवाह बने।

[caption id="attachment_138819" align="alignnone" width="1151"]मशालें लेकर गांव की मोर्चाबंदी मशालें लेकर गांव की मोर्चाबंदी[/caption]

योद्धाओं ने किए फायर

महिलाएं सिर पर कलश रखकर और पुरुष आतिशबाजी करते हुए बोचरी माता की घाटी पहुंचे। वहां मुगल चौकी पर जीत की शौर्य गाथा पढ़ी। यहां थंभ चौक पर महिलाओं ने होली को ठंडा करने की रस्म निभाई। ढोल-नगाड़ों के साथ आगे टुकड़ियां और पीछे महिलाएं चौक की तरफ रवाना हुईं। इस दौरान तलवार और लकड़ी का डंडा लेकर डांस किया, और करतब दिखाए गए। सभी महिलाएं वीर रस के गीत गा रही थीं। ओंकारेश्वर चौक पहुंचने पर बारूद की होली शुरू हुई। पांचों टुकड़ियों के योद्धाओं ने एक साथ फायर किए। आतिशबाजी की गई। तोपों में बारूद भरकर धमाके किए।

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