पुरी में जगन्नाथ रथ यात्रा: राजा क्यों लगाते हैं सोने की झाड़ू? जानिए परंपराएं

जगन्नाथ रथ यात्रा का उत्सव

पुरी में जगन्नाथ रथ यात्रा: राजा क्यों लगाते हैं सोने की झाड़ू? जानिए परंपराएं

पुरी में वार्षिक जगन्नाथ रथ यात्रा भगवान जगन्नाथ के साथ उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के लिए विशेष रथों पर आयोजित की जाती है। यह यात्रा धार्मिक श्रद्धा और सामाजिक समरसता का प्रतीक है।

पुरी में जगन्नाथ रथ यात्रा राजा क्यों लगाते हैं सोने की झाड़ू जानिए परंपराएं

राजा क्यों लगाते हैं सोने की झाड़ू? |

हर साल दुनियाभर से लाखों श्रद्धालु पुरी में आयोजित होने वाली भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा में शामिल होने पहुंचते हैं। यह हिंदू धर्म के सबसे बड़े और भव्य त्योहारों में से एक है। भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा को विशाल रथों पर विराजमान देखकर हर श्रद्धालु भावविभोर हो जाता है। हालांकि, बहुत कम लोग जानते हैं कि इस प्राचीन परंपरा के पीछे परिवार, प्रेम और भक्ति से जुड़ी एक बेहद सुंदर कहानी भी है।

भक्तों से मिलने आते है भगवान

इस रथ यात्रा की सबसे खास बात यह है कि इसमें भगवान अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए स्वयं मंदिर से बाहर आते हैं। आमतौर पर भक्त भगवान के दर्शन के लिए मंदिर जाते हैं, लेकिन इस यात्रा में भगवान ही अपने भक्तों के बीच आते हैं। हिंदू मान्यताओं के मुताबिक, भगवान जगन्नाथ हर साल अपने भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ पुरी के जगन्नाथ मंदिर से गुंडिचा मंदिर की यात्रा पर निकलते हैं।

मौसी का घर जाने की परंपरा

ऐसा कहा जाता है कि गुंडिचा मंदिर उनकी मौसी का घर है। इसलिए इस यात्रा को भगवान के अपनी मौसी के घर जाने की परंपरा है। वहां कुछ दिन ठहरने के बाद भगवान बहुदा यात्रा के माध्यम से वापस मंदिर लौटते हैं। यह परंपरा रिश्तों की अहमियत को दर्शाती है। साथ ही यह संदेश भी देती है कि भगवान के लिए भी रिश्ते, प्रेम और परिवार का महत्व है। रथ यात्रा से जुड़ी एक और मान्यता कि भगवान जगन्नाथ हर भक्त को अपना आशीर्वाद देना चाहते हैं, चाहे वह मंदिर तक पहुंच पाए या नहीं।

3 अलग-अलग लकड़ी के रथ

इसी कारण से भगवान स्वयं मंदिर से बाहर निकलकर सभी लोगों को दर्शन देते हैं। उनके लिए अमीर-गरीब, ऊंच-नीच, जाति या फिर सामाजिक भेदभाव का कोई महत्व नहीं है। यही कारण है कि जगन्नाथ रथ यात्रा को समानता और भाईचारे का प्रतीक भी माना जाता है। रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा 3 अलग-अलग लकड़ी के रथों पर सवार होते हैं। खास बात यह है कि ये रथ हर साल नए बनाए जाते हैं। 

रथों को खींचने की परंपरा

भगवान जगन्नाथ नंदीघोष नाम के 16 पहियों वाले रथ पर सवार होते हैं। भगवान बलभद्र तालध्वज नाम के 14 पहियों वाले रथ पर विराजते है। देवी सुभद्रा दर्पदलन नाम के 12 पहियों वाले रथ पर यात्रा करती हैं। हजारों श्रद्धालु मोटी रस्सियों से इन विशाल रथों को खींचते हैं। मान्यता है कि रथ खींचना शुभ और पुण्य का काम होता है। इस यात्रा की सबसे अनोखी परंपराओं में से एक यह है कि रथों का दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जाता। हर साल नीम की लकड़ी से नए रथ बनाए जाते हैं। इन रथों का निर्माण केवल एक सामान्य काम नहीं, बल्कि धार्मिक और पवित्र अनुष्ठान माना जाता है। 

यात्रा शुरू होने से पहले पुरी के गजपति महाराज छेरा पहंरा नाम की परंपरा निभाते हैं। इस दौरान वे सोने की झाड़ू से तीनों रथों के मंच की सफाई करते हैं। यह परंपरा इस बात का प्रतीक है कि भगवान जगन्नाथ के सामने सभी समान हैं। चाहे कोई राजा हो या आम इंसान, हर किसी को भगवान की सेवा करनी चाहिए।

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