नेपाल के बाद फ्रांस में भी आग: बजट कटौती पर बवाल, 1 लाख लोग सड़कों पर

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नेपाल के बाद फ्रांस में भी आग: बजट कटौती पर बवाल, 1 लाख लोग सड़कों पर

नेपाल के बाद फ्रांस में भी आग बजट कटौती पर बवाल 1 लाख लोग सड़कों पर

France Protests 2025: 1 लाख लोग सड़कों पर 200 गिरफ्तार, 80 हजार पुलिस तैनात

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 ज़मीनी गुस्सा, जलती बसें और टूटता भरोसा

France Protests 2025: नेपाल के धधकते हालात थमे भी नहीं थे कि अब यूरोप का दिल— फ्रांस, भी सुलग उठा है। पेरिस की वो खूबसूरत सड़कों पर आज कूड़ेदान उड़ते दिखे, बसें जलती रहीं, और लोग 'ब्लॉक एवरीथिंग' की तर्ज पर सरकार के खिलाफ जंग छेड़े हुए थे।

बजट कटौती और टूटते वादे: लोगों के सब्र का बांध टूटा

राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार ने देश की डूबती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए 2026 का सख्त बजट पेश किया। बचत के नाम पर 4 लाख करोड़ रुपये की कटौती—पेंशन, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक योजनाओं पर सीधी मार। पर ये सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं थी। ये उस बुज़ुर्ग की कहानी थी जिसकी पेंशन अचानक रुक गई, उस नर्स की जो अब डबल शिफ्ट में काम कर रही है, और उस छात्र की जो अब कॉलेज फीस चुका पाने की उम्मीद खो बैठा। france protests 2025 france budget cuts emmanuel macron resign

 सड़कों पर उबाल: 1 लाख लोग, 80 हजार पुलिस, 200 गिरफ्तार

'ब्लॉक एवरीथिंग' आंदोलन के तहत 1 लाख से ज्यादा लोग पेरिस और 30 शहरों में सड़कों पर उतर आए। भीड़ में कुछ नकाबपोशों ने पुलिस पर कूड़ेदान फेंके, बसों में आग लगाई, और सरकारी बिल्डिंग्स पर हमला किया। सरकार ने तुरंत 80,000 पुलिसकर्मी तैनात किए। 200 उपद्रवियों को गिरफ्तार किया गया।

 सरकार गिरी, नया पीएम लेकिन भरोसा? नहीं!

विरोध के चलते प्रधानमंत्री फ्रांस्वा बायरू को इस्तीफा देना पड़ा, और राष्ट्रपति मैक्रों ने रक्षा मंत्री लेकोर्नू को नया पीएम नियुक्त किया। यह एक साल में फ्रांस का चौथा प्रधानमंत्री है लेकिन जनता का कहना है, "चेहरे बदलने से सोच नहीं बदलती।"

 क्यों खतरनाक है यह आंदोलन?

इस विरोध की गूंज सिर्फ फ्रांस तक सीमित नहीं है। ये एक संकेत है कि जब लोगों की बुनियादी ज़रूरतों से खिलवाड़ होता है, तो लोकतंत्र भी सड़कों पर उतर आता है। और यही डर दुनिया भर की सरकारों को सताने लगा है कहीं कल ये लपटें हमारे दरवाज़े तक न आ जाएं।
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यह सिर्फ विरोध नहीं, एक चेतावनी है

फ्रांस की जलती सड़कों पर सिर्फ गुस्सा नहीं है, बल्कि टूटे भरोसे और बेरहम फैसलों की राख है। मैक्रों को अब तय करना है कि वे जनता की सुनेंगे या फिर अगला इतिहास खुद को दोहराएगा। और हम? हमें ये समझना होगा कि जब आम आदमी की जेब खाली होती है, तो संसद की मेजें हिलने लगती हैं।
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