पूजा बनी राष्ट्रशक्ति....
इतिहासकार बताते हैं कि दतिया का यह मंदिर भारत के हर बड़े युद्ध से किसी न किसी रूप में जुड़ा रहा है। यहां युद्धकाल में किए गए विशेष हवन और यज्ञ को भारत की विजय का आध्यात्मिक कारण भी माना जाता है।
यह मंदिर राजसत्ता, यश और शत्रु पर विजय दिलाने वाली देवी पीतांबरा माई को समर्पित है। इसलिए यह सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि राष्ट्रशक्ति का केंद्र भी माना जाता है।
बगलामुखी माता का पवित्र धाम...
पीतांबरा शक्तिपीठ को बगलामुखी माता का धाम भी कहा जाता है। यह ग्वालियर से करीब 65 किलोमीटर दूर स्थित है। यहां धूमावती माता की मूर्ति भी विराजमान है, जिन्हें शत्रुनाशिनी देवी कहा जाता है।
देश के बड़े नेता, व्यापारी, अधिकारी और आम लोग यहां दर्शन और हवन करने आते हैं, विशेषकर जब जीवन या देश किसी संकट से गुजर रहा होता है।
इंदिरा गांधी का गुप्त हवन — 1971 का चमत्कार...
1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दतिया में गुप्त हवन कराया था। स्थानीय पत्रकारों के अनुसार, यह हवन 16 दिसंबर 1971 को समाप्त हुआ — उसी दिन पाकिस्तान ने आत्मसमर्पण कर युद्धविराम की घोषणा की। कहा जाता है कि यह सिर्फ संयोग नहीं, बल्कि माई की कृपा का चमत्कार था।
नेहरू से वाजपेयी तक — हर नेता की आस्था का केंद्र...
1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने यहां 51 कुंडीय यज्ञ कराया था। यज्ञ के तुरंत बाद चीन ने अपनी सेना पीछे हटा ली थी। इसी तरह 1999 के कारगिल युद्ध में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, जो ग्वालियर के थे, ने भी पीतांबरा माई के मंदिर में विशेष पूजा करवाई थी। यहां की यज्ञशाला आज भी उन ऐतिहासिक अनुष्ठानों की साक्षी है।
आस्था और राष्ट्रभक्ति का संगम...
पीतांबरा शक्तिपीठ न केवल एक धार्मिक स्थल, बल्कि भारत की राजनीतिक और सैन्य इतिहास का मौन साक्षी रहा है। यह मंदिर इस बात का प्रमाण है कि जब विश्वास दृढ़ हो, तो असंभव भी संभव बन जाता है। दतिया की इस धरती पर हर युद्ध के समय की गई प्रार्थना आज भी भारत की जीत और एकता की गवाही देती है।