नवरात्रि का पहला दिन: मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना, साहस-सौभाग्य की प्रतीक

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नवरात्रि का पहला दिन: मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना, साहस-सौभाग्य की प्रतीक

नवरात्रि का पहला दिन मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना साहस-सौभाग्य की प्रतीक

chaitra Navratri: नवरात्रि का पहला दिन: मां शैलपुत्री। नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना की जाती है। 'शैल' का अर्थ है पर्वत और 'पुत्री' का अर्थ है बेटी। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। इन्हें पार्वती और हेमवती के नाम से भी जाना जाता है। मां शैलपुत्री को अखंड सौभाग्य, साहस और दृढ़ता का प्रतीक माना जाता है। मां शैलपुत्री का स्वरूप अत्यंत सौम्य, शांत और करुणामयी है। मां शैलपुत्री वृषभ (बैल) पर सवार रहती हैं।

[caption id="attachment_141981" align="alignnone" width="1183"]मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना[/caption]

प्रथम दिन का शुभ रंग पीला

बैल पर आरूढ़ होने के कारण इन्हें 'वृषारूढ़ा' भी कहा जाता है। वृषभ धर्म का प्रतीक माना जाता है। मां की दो भुजाएं हैं। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल सुशोभित है, जो शत्रुओं का नाश और तीन तापों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) का हरण करता है। उनके बाएं हाथ में कमल का पुष्प है, जो ज्ञान, पवित्रता और शांति का प्रतीक है। वे अक्सर सफेद या पीले रंग के वस्त्र धारण करती हैं (क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार इसमें भिन्नता हो सकती है, कई जगह उन्हें पीताम्बरी वस्त्रों में दिखाया जाता है क्योंकि प्रथम दिन का शुभ रंग पीला माना जाता है)।

सती का विवाह भगवान शिव से हुआ

उनके मस्तक पर अर्धचंद्र विराजमान है, जो शीतलता और दिव्य ज्ञान का प्रतीक है। वे दिव्य आभूषणों से सुसज्जित हैं। योग मार्ग में मान्यता है कि नवरात्रि के पहले दिन साधक का चित्त 'मूलाधार चक्र' में स्थित होता है। मां शैलपुत्री की पूजा से यह चक्र जाग्रत होता है, जिससे भक्त को स्थिरता और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है। मां शैलपुत्री की पौराणिक कथा उनके पूर्व जन्म से जुड़ी है, जब वे प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं और उनका नाम सती था। सती का विवाह भगवान शिव से हुआ था।

chaitra Navratri: प्रजापति दक्ष की यज्ञ की कहानी

एक बार प्रजापति दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन जानबूझकर अपने दामाद भगवान शिव और पुत्री सती को निमंत्रण नहीं भेजा। माता सती ने जब आकाश मार्ग से अन्य देवताओं को यज्ञ में जाते देखा, तो उन्होंने शिवजी से वहां जाने की हठ की। शिवजी ने उन्हें बिना निमंत्रण जाने के परिणामों के बारे में समझाया, लेकिन सती अपने पिता के घर जाने के लिए व्याकुल थीं। अंततः शिवजी ने उन्हें जाने की अनुमति दे दी। यज्ञ स्थल पर पहुंचने पर उनके पिता दक्ष और अन्य बहनों ने उनका उपहास किया और भगवान शिव के प्रति अपमानजनक शब्द कहे। अपने पति का घोर अपमान सहन न कर पाने के कारण, सती अत्यंत क्रोधित और दुखी हुईं। उन्होंने उसी क्षण यज्ञ की पवित्र अग्नि में कूदकर अपने प्राणों की आहुति दे दी। माता सती ने अगले जन्म में पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया, और उनका नाम शैलपुत्री पड़ा। इस जन्म में भी उन्होंने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की और अंततः उनका विवाह पुनः शिवजी से हुआ। अर्थात मां शैलपुत्री ही माता पार्वती हैं। मां शैलपुत्री की कथा और उनके महत्व का वर्णन मुख्य रूप से शक्ति उपासना के ग्रंथों में मिलता है। मां शैलपुत्री की कथा और नवदुर्गा के स्वरूपों का विस्तृत वर्णन 'श्री दुर्गा सप्तशती' (जो मार्कंडेय पुराण का हिस्सा है) और 'देवी भागवत पुराण' में मिलता है। दुर्गा सप्तशती के 'कवच' पाठ में नवदुर्गाओं के नामों का उल्लेख है, जिसमें सबसे पहले मां शैलपुत्री का नाम आता है: "प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी॥"

मां शैलपुत्री को प्रसन्न करने के लिए भक्त इन मंत्रों का जप करते हैं:

1. प्रार्थना मंत्र (ध्यान हेतु): वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥

chaitra Navratri:  अर्थ: मैं मनोवांछित लाभ के लिए उन मां शैलपुत्री की वंदना करता/करती हूँ, जिनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित है, जो वृषभ पर आरूढ़ हैं, हाथ में त्रिशूल धारण करती हैं और जो अत्यंत यशस्विनी हैं।

2. मुख्य पूजा मंत्र: ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥

(इस मंत्र का 108 बार जप करना अत्यंत शुभ माना जाता है।)

नवरात्रि के प्रथम दिन मां शैलपुत्री की पूजा करने से भक्त के जीवन में स्थिरता आती है, भय का नाश होता है और वह सभी चुनौतियों का सामना करने के लिए आत्मबल प्राप्त करता है। जय माता दी

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