Bengali Navratri Puja: बंगाली समाज में नवरात्रि में सिर्फ 5 दिन होती है माता की पूजा...

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Bengali Navratri Puja: बंगाली समाज में नवरात्रि में सिर्फ 5 दिन होती है माता की पूजा...

bengali navratri puja बंगाली समाज में नवरात्रि में सिर्फ 5 दिन होती है माता की पूजा

Bengali Navratri Puja: इन दिनों नवरात्रि का त्योहार चल रहा है। दुर्गा पूजा पूरे देश में पूरे विधि विधान और धूमधाम से की जाती है, लेकिन बंगाल की दुर्गा पूजा की धूम और भव्यता का कोई मुकाबला नहीं। षष्ठी से दशमी तक चलने वाला यह पांच दिवसीय पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक उत्सव है, जो समाज को ऊर्जा, आनंद औऱ उल्लास से भर देता है। Read More: Maa Tulja Bhavani Temple: पहाड़ चीरकर प्रकट हुई मां तुलजा भवानी, जानिए 3 रुपों में कैसे देती हैं दर्शन!

मां के आगमन की आहट...

बरसात के बाद जैसे ही शरद ऋतु आती है, मां दुर्गा के आगमन की आहट मिलने लगती है। नीला आकाश, सफेद बादलों की टोलियां, कांस के फूल और शिउलि की खुशबू हर ओर यही संदेश देती है– “मां आ रही हैं।” इसी समय कुम्हार परिवार पूरी श्रद्धा से मां दुर्गा और उनके चारों संतानों की प्रतिमाएं बनाने में जुट जाते हैं। घर-घर में तैयारियां शुरू हो जाती हैं और लोग नए कपड़ों व उपहारों का बेसब्री से इंतजार करने लगते हैं।

षष्ठी का बोधन...

षष्ठी के दिन मां दुर्गा सिंह पर सवार होकर अपने मायके आती हैं। इस दिन मंडपों में अल्पना से सजावट की जाती है और पुरोहित मंत्रोच्चारण के साथ देवी की प्राण प्रतिष्ठा करते हैं। इसके साथ ही पूजा का औपचारिक आरंभ होता है।

पुष्पांजलि और भोग का विशेष महत्व...

सप्तमी, अष्टमी और नवमी के दिन भक्त सुबह से निराहार रहकर पुष्पांजलि अर्पित करते हैं। देवी को फूल और बेलपत्र चढ़ाए जाते हैं। दोपहर में भोग आरती होती है, जिसमें धुनुचि नृत्य पूजा का सबसे आकर्षक हिस्सा होता है। देवी को अर्पित किए गए छप्पन भोग का प्रसाद सभी भक्तों में बांटा जाता है। शाम ढलते ही भव्य पंडालों की रौनक, थीम-आधारित सजावट, रोशनी और सांस्कृतिक कार्यक्रम माहौल को और खास बना देते हैं।

अष्टमी की संधिपूजा...

अष्टमी की रात को होने वाली संधिपूजा का विशेष महत्व है। इस अवसर पर 108 कमल और दीप अर्पित किए जाते हैं। भक्त मानते हैं कि इस पूजा से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करती हैं।

दशमी और सिंदूर खेला...

नवमी के बाद आता है दशमी, जो विदाई का प्रतीक है। इस दिन विवाहिताएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और फिर आपस में एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर ‘सिंदूर खेला’ करती हैं। यह दृश्य उत्सव का सबसे भावुक और आनंदमय पल होता है। इसके बाद देवी की मूर्तियों का विसर्जन होता है और वातावरण में गूंजता है– “आबार एशो मां” यानी “मां, फिर आना।”      

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