इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच 21 घंटे चली लंबी वार्ता बिना किसी समझौते के खत्म हो गई। इस नाकामी ने न केवल दोनों देशों के रिश्तों में तनाव बढ़ाया है, बल्कि पूरे मध्य पूर्व में संभावित युद्ध की आशंकाओं को भी तेज कर दिया है।दो हफ्ते के अस्थायी सीज़फायर पर भी अब सवाल खड़े हो गए हैं। कूटनीतिक समाधान की उम्मीद कमजोर पड़ती दिख रही है।
बातचीत क्यों हुई फेल?
वार्ता में मुख्य रूप से ईरान के परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज स्ट्रेट को लेकर मतभेद सामने आए।अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance ने स्पष्ट कहा कि 21 घंटे की बातचीत के बावजूद कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। उन्होंने इसे “फाइनल और बेस्ट ऑफर” बताया और कहा कि अब फैसला ईरान को करना है।वहीं ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को जारी रखने पर अड़ा हुआ है, जबकि अमेरिका इसे पूरी तरह खत्म करने की मांग कर रहा है।
ट्रंप का सख्त रुख
अमेरिकी राष्ट्रपति डोलान्ड ट्रंप ने भी कड़ा बयान देते हुए कहा कि “डील हो या न हो, हमें फर्क नहीं पड़ता, हम पहले ही जीत चुके हैं।विशेषज्ञ मानते हैं कि यह बयान अमेरिका की “प्रेशर पॉलिटिक्स” को दर्शाता है। लेकिन इससे कूटनीतिक समाधान की संभावना और कमजोर हो सकती है।
होर्मुज स्ट्रेट बना सबसे बड़ा फ्लैशपॉइंट
होर्मुज स्ट्रेटइस पूरे संकट का केंद्र बना हुआ है। यह दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल सप्लाई का बड़ा हिस्सा गुजरता है।ईरान ने संकेत दिया है कि जब तक उसकी शर्तें नहीं मानी जातीं, तब तक इस मार्ग को पूरी तरह खोलना संभव नहीं होगा.रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपने नौसैनिक जहाज तैनात किए हैं और माइन्स हटाने की कोशिश की है। हालांकि ईरान ने चेतावनी दी है कि ऐसी किसी भी कार्रवाई पर जवाबी हमला किया जाएगा।
क्या फिर शुरू होगी जंग?
जानकारों मानना है कि अगर कूटनीति विफल रहती है, तो यह संघर्ष सिर्फ क्षेत्रीय नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था खासतौर पर तेल बाजार पर भी बड़ा असर डाल सकता है।
