तानसेन समारोह 2025: सुर-ताल में डूबी तानसेन की तीसरी संध्या, भक्ति और रागों ने रचा अलौकिक वातावरण

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तानसेन समारोह 2025: सुर-ताल में डूबी तानसेन की तीसरी संध्या, भक्ति और रागों ने रचा अलौकिक वातावरण

तानसेन समारोह 2025 सुर-ताल में डूबी तानसेन की तीसरी संध्या भक्ति और रागों ने रचा अलौकिक वातावरण

तानसेन समारोह 2025: 101वें तानसेन संगीत समारोह की तीसरी संध्या सुर, ताल और भक्ति के रंगों से सराबोर रही। बुधवार शाम जैसे ही संगीत सभाओं का आरंभ हुआ, वैसे ही ठंडी हवाओं में घुलते रागों ने श्रोताओं को एक अलग ही लोक में पहुंचा दिया। गायन और वादन की इस संध्या ने शास्त्रीय संगीत की गहराई और उसकी आध्यात्मिक शक्ति का अद्भुत अनुभव कराया।

तानसेन समारोह 2025: ध्रुपद गायन से सजी संगीत सभा

तीसरे दिन की शुरुआत शारदा नाद मंदिर संगीत महाविद्यालय, ग्वालियर के विद्यार्थियों की प्रस्तुति से हुई। विद्यार्थियों ने अपने सधे हुए और आत्मविश्वास से भरे ध्रुपद गायन से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।उन्होंने राग मारू बिहाग में चौताल की रचना ‘प्रथम नाद सुर साधे’ प्रस्तुत की। यह प्रस्तुति न केवल शास्त्रीय परंपरा का सुंदर उदाहरण रही, बल्कि युवा कलाकारों की साधना और अनुशासन को भी दर्शाती नजर आई।

तानसेन समारोह 2025: शहनाई की स्वर-लहरियों में घुला भाव और स्मृति का रस

इसके बाद मंच पर मुंबई से पधारे सुविख्यात शहनाई वादक पंडित शैलेष भागवत उपस्थित हुए। उनकी शहनाई की मधुर ध्वनि ने सभा को भावुक स्मृतियों और रस से भर दिया।पंडित भागवत ने राग शुद्ध कल्याण से अपनी प्रस्तुति का शुभारंभ किया। विलंबित एकताल में उन्होंने राग की गरिमा को विस्तार से उकेरा और फिर द्रुत तीनताल में सजीव लयकारी के साथ श्रोताओं की तालियां बटोरीं। उनकी प्रस्तुति ने यह सिद्ध किया कि शहनाई केवल मांगलिक वाद्य नहीं, बल्कि गहन भावों को व्यक्त करने का सशक्त माध्यम भी है।

संजीव अभ्यंकर के स्वर में भक्ति और शास्त्रीय सौंदर्य

सायंकालीन सभा की प्रमुख गायन प्रस्तुति पुणे से आए प्रख्यात गायक और मप्र शासन के राष्ट्रीय कुमार गंधर्व सम्मान से अलंकृत पंडित संजीव अभ्यंकर की रही। देश-विदेश में अपनी प्रस्तुतियों से पहचान बना चुके अभ्यंकर ने तानसेन समारोह के मंच पर विशेष प्रभाव छोड़ा। उन्होंने राग जोग में ‘नाही परत चित चैन जाही, लागी सोही जाने सावरे की सेन’ बंदिश प्रस्तुत की। इसके बाद राग भिन्न षड्ज में ‘अजहु ना आए सुघर प्रिय श्याम’ बंदिश से उन्होंने सभा को भक्तिरस में डुबो दिया। उनके स्वर में भाव, शुद्धता और शास्त्रीय मर्यादा का सुंदर संतुलन देखने को मिला।

चार वाद्यों का अनूठा संगीतमय संवाद

तीसरे दिन की अंतिम प्रस्तुति अपने आप में विशेष रही। भुवनेश्वर से आए कलाकारों ने चार प्रमुख शास्त्रीय वाद्यों के सधे हुए संवाद से श्रोताओं को एक नया अनुभव दिया। वायलिन पर अग्निमित्रा बेहरा, बांसुरी पर अभिराम नंदा, तबले पर विश्वारंजन नंदा और पखावज पर शिवशंकर सतपति ने मंच साझा किया। जैसे ही वादन शुरू हुआ, पूरा सभागार संगीतमय ऊर्जा से भर उठा। अंत में ओडिसी संगीत की नाट्यरंगी धुन के साथ इस मनोहारी संध्या का समापन हुआ, जिसने श्रोताओं के मन में देर तक गूंजती स्मृतियां छोड़ दीं।  

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