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असम चुनाव में ‘चाय जनजाति’ बना सियासी तुरुप का इक्का, झारखण्ड CM सोरेन के दांव से कांग्रेस की बढ़ी मुश्किलें

By : Rohan Umak
असम चुनाव में ‘चाय जनजाति’ बना सियासी तुरुप का इक्का, झारखण्ड CM सोरेन के दांव से कांग्रेस की बढ़ी मुश्किलें

Jharkhand politics: असम विधानसभा चुनाव में इस बार सियासी समीकरण तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के प्रमुख और झारखण्ड राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने ‘चाय जनजाति’ के मुद्दे को उठाकर ऐसा दांव चला है, जिससे कांग्रेस की राह और कठिन होती दिख रही है। यह चुनाव अब केवल सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि पहचान और अधिकार की राजनीति का केंद्र बन कर उभर रहा है।

सीट बंटवारे में अनबन, JMM ने असम के लिए अकेले भरी हुंकार

असम चुनाव में विपक्षी एकता की हकीकत एक बार फिर उजागर हो गई है। कांग्रेस और JMM के बीच सीटों का तालमेल नहीं बन सका, जिसके बाद हेमंत सोरेन ने अकेले मैदान में उतरने का फैसला किया। JMM ने पहली बार असम में चुनाव लड़ते हुए 21 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं, जिनमें से 17 सीटों पर सीधा मुकाबला कांग्रेस से है।

[caption id="attachment_141535" align="alignnone" width="1200"]झारखण्ड मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन झारखण्ड मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन[/caption]

यह कदम सोरेन के लिए बिहार की पुरानी गलती से सबक लेने जैसा माना जा रहा है, जहां उनकी पार्टी को चुनावी मैदान से बाहर रहना पड़ा था।

Jharkhand politics: ‘जल, जंगल और जमीन’ का नारा अब असम में गूंजेगा

हेमंत सोरेन ने असम के ‘टी-ट्राइब’ यानी चाय बागान मजदूरों को केंद्र में रखकर चुनावी रणनीति तैयार की है। राज्य में इनकी आबादी 45 से 70 लाख के बीच मानी जाती है। JMM ने जनजातीय भावनाओं को साधने के लिए ‘दूरी कितनी भी हो, रिश्ता माटी का है’ जैसे नारे के साथ अभियान शुरू किया है।

पार्टी का दावा है कि वह चाय बागान के श्रमिकों को उनका सम्मान और अधिकार दिलाने के लिए चुनाव लड़ रही है।

[caption id="attachment_143103" align="alignnone" width="1200"]असम की ट्री-ट्राइब असम की ट्री-ट्राइब[/caption]

झारखंड मूल के मजदूर बने सियासत का केंद्र

असम के चाय बागानों में काम करने वाले मजदूरों का बड़ा हिस्सा झारखंड मूल का है, जिनमें संताल, मुंडा और उरांव समुदाय शामिल हैं। इन्हें ‘चाय जनजाति’ के रूप में जाना जाता है, लेकिन इन्हें अब तक अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा नहीं मिला है। हेमंत सोरेन ने इसी मुद्दे को चुनावी हथियार बनाते हुए आदिवासी समुदाय को उनके अधिकार दिलाने का वादा किया है।

कांग्रेस की कमजोर स्थिति, JMM से बढ़ी चुनौती

पिछले एक दशक में असम में कांग्रेस की स्थिति कमजोर हुई है। दल-बदल और नेतृत्व की चुनौतियों के कारण उसका जनाधार घटा है। वर्तमान मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाना भी इसका बड़ा कारण रहा है। अब JMM के मैदान में उतरने से कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगने की आशंका बढ़ गई है, खासकर ऊपरी असम के इलाकों में।
टैग्स: झारखंड

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