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E-cigarette: मीठे धुएं के पीछे छिपा कड़वा सच,कुछ आविष्कार समाज के लिए संकट

By : divya mistry
E-cigarette: मीठे धुएं के पीछे छिपा कड़वा सच,कुछ आविष्कार समाज के लिए संकट
E-cigarette: आज की तकनीक जहां मानवता के हित के लिए विकसित हुई, वहीं कुछ आविष्कार समाज के लिए संकट भी बन गए हैं। ई-सिगरेट इसका ताजा उदाहरण है, जो युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। आकर्षक फ्लेवर, स्टाइलिश डिजाइन और सोशल मीडिया ट्रेंड्स ने इसे एक "कूल" आदत बना दिया है, लेकिन सच्चाई यह है कि यह धीमा ज़हर बनकर युवा पीढ़ी के भविष्य को निगल रहा है। [caption id="attachment_86185" align="alignnone" width="240"]E-cigarette लेखक किरोड़ी लाल मीना[/caption]

E-cigarette: मानसिक और शारीरिक रूप से निर्बल

ई-सिगरेट एक बैटरी चालित उपकरण है, जो निकोटीन और रसायनों से भरे लिक्विड को गर्म कर वाष्प बनाता है, जिसे सांस के जरिए अंदर लिया जाता है। पारंपरिक सिगरेट के धुएं की बजाय इसमें भाप निकलती है, जो दिखने में भले ही कम खतरनाक लगे, लेकिन इसके प्रभाव कहीं ज्यादा गंभीर हैं। इसमें मौजूद निकोटीन मस्तिष्क विकास पर असर डालता है और युवाओं को मानसिक और शारीरिक रूप से निर्बल करता है।

E-cigarette: अनदेखी इसे और खतरनाक बना रही

शोधों में यह स्पष्ट हुआ है कि ई-सिगरेट का सेवन करने वाले किशोरों में फेफड़ों की बीमारियां, हृदय रोग, तनाव, अवसाद और ध्यान भटकने जैसी समस्याएं आम हो चुकी हैं। कई मामलों में आत्महत्या की प्रवृत्ति भी सामने आई है। इसके बावजूद समाज की चुप्पी और अभिभावकों की अनदेखी इसे और खतरनाक बना रही है।

E-cigarette: हकीकत में वे खुद को खोखला कर रहे

ई-सिगरेट की लत अब सिर्फ नशा नहीं, बल्कि पहचान और अभिव्यक्ति का भ्रम बन चुकी है। युवाओं को लगता है कि वे इससे आधुनिक बन रहे हैं, जबकि हकीकत में वे खुद को खोखला कर रहे हैं।

E-cigarette: माता-पिता को बच्चों से खुलकर संवाद करना होगा

समाधान जागरूकता से ही संभव है। स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता अभियान चलाकर यह बताया जाना चाहिए कि यह कोई फैशन नहीं, बल्कि एक धीमा आत्मघात है। माता-पिता को बच्चों से खुलकर संवाद करना होगा, उन्हें डराने के बजाय समझाना और मार्गदर्शन देना होगा।

E-cigarette: जहरीली आदत युवाओं तक न पहुंचे

भारत में ई-सिगरेट पर कानूनी प्रतिबंध है, जिसमें निर्माण, बिक्री, वितरण, भंडारण और प्रचार तक को अपराध माना गया है। सरकार की जिम्मेदारी के साथ-साथ समाज, स्कूल, मीडिया और हर नागरिक को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि यह जहरीली आदत युवाओं तक न पहुंचे।

हमें मिलकर एक ऐसा समाज बनाना है जहां धुएं नहीं, उम्मीदें उड़ें।

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