समुद्र मंथन से जुड़ी है जलाभिषेक की परंपरा...
पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवताओं और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन में जब सबसे पहले हलाहल विष निकला, तो सृष्टि के सभी प्राणी संकट में पड़ गए। उस समय भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए वह विष पी लिया। उन्होंने उसे गले से नीचे नहीं उतरने दिया, जिससे उनका गला नीला पड़ गया और वे 'नीलकंठ' कहलाए। विष के प्रभाव से उनके शरीर में तीव्र गर्मी उत्पन्न हो गई, जिसे शांत करने के लिए देवताओं ने शिव पर जल, दूध, शहद आदि ठंडी चीजें चढ़ाईं। तभी से शिवलिंग पर जल चढ़ाने और रुद्राभिषेक करने की परंपरा शुरू हुई।क्यों करते हैं जल और पंचामृत से रुद्राभिषेक?
जल
शिवलिंग पर जल चढ़ाना सबसे सामान्य और मुख्य क्रिया है। यह भगवान शिव को शीतलता प्रदान करता है। माना जाता है कि जल चढ़ाने से मानसिक तनाव और नकारात्मक ऊर्जा का शमन होता है। जल में तुलसी या गंगाजल मिलाकर अर्पण करने से इसका पुण्य और अधिक बढ़ जाता है।
दूध
दूध को सात्विक और पवित्र पदार्थ माना गया है। विशेष रूप से गाय के दूध से शिवलिंग का अभिषेक करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। विष्णु पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, जब समुद्र मंथन के समय विष पीने के बाद भगवान शिव के गले की तपन बढ़ने लगी थी, तब देवताओं ने उन्हें दूध अर्पित किया, जिससे उनके शरीर को शीतलता मिली।
दही
दही से अभिषेक करने से संतान सुख, वाहन और घर की प्राप्ति होती है। यह शरीर की गर्मी को कम करता है और मानसिक शांति देता है। यह भी शिव को प्रिय शीतल पदार्थों में गिना जाता है।
शहद
शहद मधुरता और समृद्धि का प्रतीक है। शास्त्रों के अनुसार, शहद से रुद्राभिषेक करने से धन और वैभव की प्राप्ति होती है, साथ ही पुराने रोगों से मुक्ति मिलती है। यह शिव को प्रिय पंचामृत का महत्वपूर्ण घटक भी है।
घी
घी से रुद्राभिषेक करने से वातावरण और हृदय की शुद्धि होती है। यह ऊर्जा को सकारात्मक बनाता है। हवन आदि धार्मिक अनुष्ठानों में घी का प्रयोग इसी उद्देश्य से किया जाता है कि नकारात्मक ऊर्जा नष्ट हो और स्थान पवित्र हो जाए।