पूजा के बाद आरती का महत्व

क्या आपने कभी सोचा है कि पूजा के बाद आरती क्यों की जाती है?

हिन्दू पूजा में आरती का विशेष स्थान है, जिसे पूजा के समापन पर किया जाता है। यह भक्ति, प्रकाश और आत्मज्ञान का प्रतीक है।

By : सोनिया रायकवार
क्या आपने कभी सोचा है कि पूजा के बाद आरती क्यों की जाती है?

हिन्दू धर्म में पूजा के द्वारा भक्त अपने ईष्टदेव से जुड़ने का प्रयास करता है। मंत्र, पुष्प, जल और भावों के साथ जब पूजा समाप्त होता है, तो लोग उसके बाद आरती जरूर करते हैं लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि पूजा के बाद आरती करना क्यों आवश्यक है? क्या यह केवल एक धार्मिक परंपरा है या इसके पीछे कोई गहरा अर्थ छिपा है?

आपने देखा होगा कि हर पूजा के समाप्ति के बाद आरती अवश्य होती है। आरती के बना कोई भी धार्मिक अनुष्ठान पूरा नहीं होता। आरती करना इतना महत्वपूर्ण है कि इसके बारे में हिन्दू धर्म के कई शास्त्रों में उल्लेख मिलता है। जैसे कि, विष्णुधर्मोत्तर पुराण में कहा गया है कि जो धूप, आरती को देखता है, वह अपनी कई पीढ़ियों का उद्धार करता है। वहीं उत्तर स्कंद पुराण में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति मंत्र नहीं जानता, पूजा की विधि नहीं जानता लेकिन आरती कर लेता है, तो भगवान उसकी पूजा को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लेते हैं। तो, इन बातों से आप समझ ही सकते हैं कि आरती करना कितना महत्वपूर्ण माना गया है। लेकिन आरती पूजा के बाद ही क्यों की जाती है, 

आरती क्यों आवश्यक है?

शास्त्रों के अनुसार, "आरती" शब्द संस्कृत के "आरात्रिक" से आया है, जिसका अर्थ है – अंधकार को हटाना। पूजा के अंत में आरती करना प्रकाश और ऊर्जा का आह्वान है। आरती, दीप, कपूर या घी के माध्यम से की जाती है, जिसमें प्रकाश की लौ को प्रभु के सामने घुमाई जाती है। यह लौ भक्ति, प्रकाश और आत्मज्ञान का प्रतीक होती है। पूजा के माध्यम से जो कुछ भी अर्पित किया गया, उसका अंतिम समर्पण आरती में होता है। पूजा के समय उत्पन्न दिव्य ऊर्जा को आरती की लौ, घंटी, शंख और भक्ति गीतों के माध्यम से पूरे वातावरण में फैलाया जाता है। यह कंपन हमारे मन, घर और आसपास की नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है। इसके अलावा, पूजा के दौरान हमारा मन कई बार इधर-उधर भटकता है। आरती के समय दीपक की लौ को एकटक निहारते हुए, जब हम भजन या आरती गाते हैं, तब मन पूरी तरह से भक्ति में लीन हो जाता है।

आध्यात्मिक रूप से देखें

दीपक की लौ आत्मा और ज्ञान का प्रतीक मानी जाती है। जब हम उस लौ को प्रभु के समक्ष घुमाते हैं, तो हम अपने भीतर के अज्ञान, भय और भ्रम को दूर करने का प्रयास करते हैं। आरती के प्रकाश को देखने से हमारी दृष्टि और मन शुद्ध होते हैं। यह ध्यान और मानसिक शांति प्रदान करती है। आरती वह क्षण है जब भक्त और भगवान के बीच कोई दूरी नहीं रह जाती। यह केवल विधि नहीं, बल्कि भाव है। आरती के बाद उसकी लौ को अपने हाथों से स्पर्श कर माथे से लगाना यानि ईश्वरीय ऊर्जा का आशीर्वाद लेना होता है।

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