गरुड़ मंदिर के बारे में विस्तार

ऋषिकेश में गरुड़ देवता का ऐसा मंदिर जहां जाने से दूर होता है कालसर्प दोष!

ऋषिकेश के पास स्थित गरुड़ मंदिर, जिसे गरुड़ चट्टी के नाम से भी जाना जाता है, अपने प्राकृतिक सौंदर्य और पौराणिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है।

By : हेमा गुप्ता
ऋषिकेश में गरुड़ देवता का ऐसा मंदिर जहां जाने से दूर होता है कालसर्प दोष!

ऋषिकेश में गरुड़ देवता का ऐसा मंदिर जहां जाने से दूर होता है कालसर्प दोष!

Garunda Temple In Rishikesh: उत्तराखंड के ऋषिकेश से करीब 10 किलोमीटर दूर नीलकंठ महादेव मंदिर है। फिर वहां से 18 किलोमीटर पहले पौड़ी जिले में एकमात्र गरुड़ मंदिर है, जो कि गरुड़ चट्टी के नाम से जाना जाता है। 

कहा जाता है, जो भक्त इस मंदिर में जाते है, उन्हें कालसर्प दोष से मुक्ति मिल जाती है। 

प्रकृतिक वातावरण से घिरा हुआ मंदिर 

मंदिर चारों ओर पेड़-पौधों से घिरा हुआ है। चारों ओर प्राकृतिक मनमोहक दृश्य दिखाई देते है। मंदिर के पास ही एक कुंड बना है, जिसमें रंग-बिरंगी मछलियां तैरती रहती है। जो कि वहां की प्राकृतिक खूबसूरती को बढ़ा देता है। कहा जाता है, यह उत्तराखंड का एक मात्र गरुड़ देव का मंदिर है। यह मंदिर काफी प्रसिद्ध है, यहां दूर-दूर से श्रद्धालु भगवान के दर्शन करने आते हैं। 

गरुड़ देव से जुड़ी पौराणिक कथा

पौराणिक कथाओं के मुताबिक,  ऋषि कश्यप की 2 पत्निया थीं, एक का नाम विनीता और दूसरी का नाम कदरू था। दोनों आपस में बहनें थीं। गरुड़ देव विनीता के पुत्र थे। वहीं कदरू के पुत्र सर्प थे। एक दिन विनीता और कदरू ने नदी के पार एक घोड़ा देखा। फिर दोनों ने शर्त लगाई- विनीता ने कहा कि - घोड़े की पूंछ सफेद है, वहीं कदरू ने कहा कि- घोड़े की पूंछ काली है। फिर करू ने कहा कि - अगर घोड़े की पूंछ काली निकली तो तुम्हें मेरी दासी बनना पड़ेगा'।

इस बात को विनीता के पुत्रों ने सुन ली और वो घोड़े की पूंछ पर लटक गए। जिससे उसकी पूंछ काली दिखने लगी. गरुड़ की माता को कदरू की दासी बनना पड़ा।

वरुड़ देव ने निकाली तरकीब

वरुड़ देव  कदरू के पास गए और उनसे कहा कि- 'अगर मैं स्वर्गलोक से अमृत कलश लाकर दूं, तो मेरी माता को दासता से मुक्त कर दें।'  कदरू इस बात को मान गई फिर 

गरुड़ भगवान इंद्र के पास पहुंचे और उनसे विनती कर अमृत कलश धरतीलोक पर ले गए और कदरू को दे दिया, जिससे उनकी माता मुक्त हो गई। वहीं अमृत कलश भी कदरू से लेना था। तो इस बीच भगवान विष्णु के प्रिय भक्त नारद ने एक माया रची और सर्पों के द्वारा एक यज्ञ करने की बात कही।

नारद मुनि ने सर्पों से कहा कि- 'यह यज्ञ करने से पहले नदी में स्नान करना जरूरी है।'  यह सुनकर सर्प अमृत कलश वहीं रखकर नदी में नहाने चले गए> तभी गरुड़ ने वहां से अमृत कलश उठाकर देवराज इंद्र को सौंप दिया और उनकी माता दासता से भी मुक्त हो गईं।
 तभी से गरुड़ और सर्प के बीच में दुश्मनी कायम है।

क्यों है इस स्थान का नाम गरुड़ चट्टी?

बताया जाता है कि, गरुड़ इस पहाड़ पर बैठकर तपस्या किया करते थे। वो भगवान विष्णु के भक्त के साथ - साथ उनके वाहन भी थे। वो इस चट्टान पर आराम किया करते थे। तभी से उस स्थान का नाम गरुड़ की चट्टी पड़ गया। 
 

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