माता पार्वती और प्रभु राम का वनवास...
पौराणिक कथा के अनुसार, कहा जाता है कि वनवास के दौरान भगवान राम की परीक्षा लेने के लिए माता पार्वती ने इसी जंगल में सीता का रूप धारण किया था। लेकिन भगवान राम ने उन्हें पहचान लिया। इसके बाद माता पार्वती अपने असली रूप में प्रकट हुईं और शेर की सवारी को लोहे की जंजीर से बांधकर वहां से चली गईं।
आज भी इस मंदिर में उस शेर की मूर्ति स्थापित है, जिसके गले में जंजीर बंधी हुई है। सैकड़ों साल बीत जाने के बाद भी जंजीर जस की तस है और इसमें जंग का कोई निशान नहीं है।
प्रकृति वातावरण और चमत्कारों से भरा मंदिर...
सियादेवी मंदिर का निर्माण भी अपने आप में अनोखा और चमत्कारिक है। वर्ष 1963 में स्थानीय लोगों ने मंदिर बनाने की योजना बनाई। ईंट बनाने के लिए भट्ठे में आग लगाई गई, लेकिन रात भर हुई तेज बारिश ने लोगों को लगा कि सारी ईंटें खराब हो गई होंगी।
अगली सुबह जब लोग भट्ठे के पास पहुंचे तो देखा कि बारिश के बावजूद ईंटें पूरी तरह पक चुकी थीं। इसके बाद बेल के गुदे और गुड़ की मदद से मंदिर का निर्माण किया गया। इस तरह मंदिर का निर्माण प्रकृति और स्थानीय परंपरा के अद्भुत संगम का उदाहरण बन गया।
आस्था के साथ प्राकृतिक सौंदर्य का बेहतरीन नजारा...
सियादेवी मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि यह प्राकृतिक सौंदर्य का भी अद्भुत उदाहरण है।
मंदिर के चारों ओर हरे-भरे पेड़ और झरने हैं। खासकर बारिश के दिनों में यह स्थल अत्यंत मनोहारी दृश्य प्रस्तुत करता है।
आस्था और त्योहारों का केंद्र...
हर साल नवरात्रि और नए साल के मौके पर भक्तों की भारी भीड़ इस मंदिर में उमड़ती है।
लोग न केवल माता के दर्शन करते हैं बल्कि मंदिर के आसपास की प्राकृतिक सुंदरता का भी आनंद लेते हैं। यह मंदिर आस्था, इतिहास और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम है।