Jharkhand politics: असम विधानसभा चुनाव में इस बार सियासी समीकरण तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के प्रमुख और झारखण्ड राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने ‘चाय जनजाति’ के मुद्दे को उठाकर ऐसा दांव चला है, जिससे कांग्रेस की राह और कठिन होती दिख रही है। यह चुनाव अब केवल सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि पहचान और अधिकार की राजनीति का केंद्र बन कर उभर रहा है।
सीट बंटवारे में अनबन, JMM ने असम के लिए अकेले भरी हुंकार
असम चुनाव में विपक्षी एकता की हकीकत एक बार फिर उजागर हो गई है। कांग्रेस और JMM के बीच सीटों का तालमेल नहीं बन सका, जिसके बाद हेमंत सोरेन ने अकेले मैदान में उतरने का फैसला किया। JMM ने पहली बार असम में चुनाव लड़ते हुए 21 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं, जिनमें से 17 सीटों पर सीधा मुकाबला कांग्रेस से है।
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झारखण्ड मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन[/caption]
यह कदम सोरेन के लिए बिहार की पुरानी गलती से सबक लेने जैसा माना जा रहा है, जहां उनकी पार्टी को चुनावी मैदान से बाहर रहना पड़ा था।
Jharkhand politics: ‘जल, जंगल और जमीन’ का नारा अब असम में गूंजेगा
हेमंत सोरेन ने असम के ‘टी-ट्राइब’ यानी चाय बागान मजदूरों को केंद्र में रखकर चुनावी रणनीति तैयार की है। राज्य में इनकी आबादी 45 से 70 लाख के बीच मानी जाती है। JMM ने जनजातीय भावनाओं को साधने के लिए ‘दूरी कितनी भी हो, रिश्ता माटी का है’ जैसे नारे के साथ अभियान शुरू किया है।
पार्टी का दावा है कि वह चाय बागान के श्रमिकों को उनका सम्मान और अधिकार दिलाने के लिए चुनाव लड़ रही है।
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असम की ट्री-ट्राइब[/caption]