
village life: क्या कभी आपने बिना अलार्म के आंख खुलने वाली सुबह देखी है? जहां चिड़ियों की चहचहाहट, ताज़ी हवा और मां के हाथ की रोटी आपका स्वागत करती है।
शायद नहीं, क्योंकि हम में से ज़्यादातर अब शहरों की ऊँची इमारतों में रहते हैं, जहाँ नींद भी थकी हुई होती है।
लेकिन एक बार फिर सोचिए – क्या सच में यही जीवन है?
मैं बात कर रहा हूं अपने दादा जी के गांव की – बिहार के एक छोटे से कोने में बसा, पेड़ों की छांव में पलता, बिना WiFi के भी जुड़ा हुआ।
हर बार जब मैं वहां जाता हूं, तो लगता है जैसे वक़्त कुछ पल के लिए रुक गया हो।
village life: शाम होते ही चौपाल पर बैठने की होड़
गांव के रामू काका, जो सालों से हल चला रहे हैं, उनके चेहरे पर जितनी संतुष्टि है, उतनी तो शायद एक कॉरपोरेट ऑफिस के CEO के पास भी नहीं होती। न टीवी है, न Netflix, फिर भी शाम होते ही चौपाल पर बैठने की होड़ रहती है।
लोग मिलते हैं, बात करते हैं, हँसते हैं, रोते हैं – एक-दूसरे के जीवन का हिस्सा बनते हैं।
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एक बार दादी ने कहा था,
बेटा, पैसा सब कुछ हो सकता है, पर जब खाट पर लेटकर आम के पेड़ की छांव में नींद आती है, तो वो सुख रुपयों से नहीं आता। तब समझ आया कि असली अमीरी क्या होती है।
शहर में जहां लोग अकेलेपन से जूझते हैं, वहीं गांव में पड़ोसी आपको बेटे की तरह मानते हैं।
एक बार की बात है, मेरी मां बीमार पड़ीं और गांव की आधी महिलाएं घर पर दवा और खाना लेकर आ गईं।
ऐसा अपनापन – क्या किसी मेट्रो सिटी की सोसाइटी में देखा है?
belongingness का, simplicity का, और असली खुशी
गांव की ज़िंदगी सिर्फ सादगी नहीं, वो एक एहसास है – belongingness का, simplicity का, और असली खुशी का।
शहरों की भागदौड़ में हम जो खोते जा रहे हैं, वो शायद किसी गांव की मिट्टी में आज भी सुरक्षित है।
अगर कभी ज़िंदगी बोझ लगे, तो एक बार गांव की राह जरूर पकड़ना – शायद वहां तुम्हें खुद से मुलाकात हो जाए।
village life: कभी-कभी सबसे गहरी बातें, सबसे शांत जगहों में सुनाई देती हैं। और गांव… वो जगह है जहां दिल बोलता है, और आत्मा सुनती है।
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