सीतापुर: पत्रकार हत्याकांड के शूटर सगे भाई STF एनकाउंटर में ढेर!

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सीतापुर: पत्रकार हत्याकांड के शूटर सगे भाई STF एनकाउंटर में ढेर!

सीतापुर पत्रकार हत्याकांड के शूटर सगे भाई stf एनकाउंटर में ढेर

सीतापुर में पत्रकार हत्याकांड: एक कहानी जो दर्द, डर और आखिरकार ...

सीतापुर में पत्रकार हत्याकांड: सीतापुर की गर्म दोपहर थी। लोग अपने-अपने काम में लगे थे, लेकिन STF और पुलिस की टीम उस दिन एक अलग ही मिशन पर निकली थी। उन्हें जानकारी मिली थी कि दो खूंखार अपराधी—जो 5 महीने पहले एक पत्रकार को दिनदहाड़े गोलियों से छलनी कर फरार हो गए थे—पिसावां इलाके में घूम रहे हैं। और फिर… वही हुआ, जिसका इंतज़ार न सिर्फ राघवेंद्र बाजपेयी का परिवार कर रहा था, बल्कि पूरा प्रदेश। दोनों शूटर, राजू उर्फ रिजवान और संजय उर्फ अकील खान—जो सगे भाई थे—एनकाउंटर में मारे गए। शायद किसी ने उन्हें सिखाया नहीं था कि कितनी भी गोलियां चलाई जाएं, एक न एक दिन सच्चाई सामने आ ही जाती है। [caption id="attachment_98668" align="alignnone" width="512"]Journalist Murder Case Sitapur Shooters Killed in STF Encounter राघवेंद्र बाजपेई[/caption]

क्यों मारा गया पत्रकार राघवेंद्र?

राघवेंद्र बाजपेयी सिर्फ एक नाम नहीं था। वह आवाज़ था उस सच्चाई की, जिसे बहुत से लोग दबाना चाहते थे। एक निर्भीक पत्रकार, जो महोली तहसील में भ्रष्टाचार और मंदिर परिसर में हो रहे अनैतिक कृत्यों पर नज़र रखे हुए था। जिस दिन राघवेंद्र ने कारेदेव मंदिर में पुजारी शिवानंद बाबा को आपत्तिजनक हालत में देखा, उस दिन से ही उसकी मौत की घड़ी तय हो गई थी। उसे चुप कराने के लिए, दो सुपारी किलर बुलाए गए—वो भी अपने ही गांव के। सोचिए, एक पत्रकार ने सच्चाई उजागर की और उसकी कीमत उसे जान देकर चुकानी पड़ी। एक परिवार उजड़ गया, मां-बाप का सहारा छिन गया और बच्चों से उनका हीरो।

एनकाउंटर में अंत हुआ एक खौफनाक अध्याय का

STF और पुलिस ने दोनों शूटरों को रोकने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने फायरिंग शुरू कर दी। जवाबी कार्रवाई में दोनों को गोली लगी और अस्पताल पहुंचते-पहुंचते उनका अंत हो गया। Journalist Murder Case Sitapur Shooters Killed in STF Encounter

क्या ये इंसाफ है?

शायद हां। लेकिन जो मां अपने बेटे को रोज़ तस्वीरों में देखती है, वो कभी भी संतुष्ट नहीं होगी। जो बहन राखी लिए आज भी उसके लौटने का इंतज़ार करती है, वो कैसे मानेगी कि इंसाफ हो गया?

इस कहानी में सिर्फ अपराध नहीं था, रिश्ते भी थे…

राजू और संजय—सगे भाई। एक ही घर में पले-बढ़े, मां हिंदू थी और पिता मुस्लिम। दो मजहबों का संगम, लेकिन सोच में सिर्फ नफरत और अपराध था। एक दिन उस मां ने अपने बेटों को खेलते देखा होगा, और एक दिन टीवी पर उनकी लाश। कितना कुछ बदल जाता है, जब इंसान रास्ता भटकता है।

पत्रकार होना आज के दौर में कितना खतरनाक है?

राघवेंद्र की हत्या सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी—वो हमला था पत्रकारिता की आत्मा पर। आज जब पत्रकार सच्चाई की बात करते हैं, तो उन्हें डर नहीं होता कि कौन नाराज़ होगा, बल्कि ये डर होता है कि कहीं अगला निशाना वे खुद न बन जाएं। Journalist Murder Case Sitapur Shooters Killed in STF Encounter

आखिर में…  

इस एनकाउंटर से एक संदेश जरूर गया है—सिस्टम देर से जागे, लेकिन जब जागे तो न्याय किया। लेकिन राघवेंद्र वापस नहीं आएगा। अब ज़रूरत है कि ऐसे पत्रकारों की सुरक्षा के लिए ठोस कानून बने, ताकि कोई और राघवेंद्र सच्चाई की कीमत जान देकर न चुकाए और हम, आम नागरिक... हमें भी सोचने की ज़रूरत है कि हम किस समाज में जी रहे हैं। जहां एक पुजारी की लाज बचाने के लिए एक पत्रकार को मार दिया गया। क्या अब भी हम चुप रहेंगे? Read More:- Korba में गजराज की चिहाड़: 46 हाथियों का झुंड हाईवे पार करता दिखा, 85 गांवों में बजा सायरन अलर्ट Watch Now :-मराठी भाषा पर भिड़ीं महिलाएं! लोकल ट्रेन में हुआ हाईवोल्टेज ड्रामा

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